भारतकोश
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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पृष्ठ 107

कबीर मन मरकट भया, कहूँ न नेक ठहराय ।
सत्य नाम बाँधे बिना, जित भावे तित जाय ॥

साहिब कहते हैं कि यह मन तो बन्दर की तरह उछल-कूद करने वाला है । यह कभी अच्छा बनकर नहीं रह सकता । सच्चे नाम से बाँधे बिना तो यह जहाँ दिल करे, चला जायेगा ।

सबद

सोई काल धरे औतारा

राम कृष्ण औतारी आहीं । भोगे कर्म जाड़ तन माहीं ॥
दस औतार निरंजन धरिया । सोऊ काल बस भौं में परिया ॥
सोई निरंजन सोई निरंकारा । सोई काल धरै औतारा ॥
कर्म भाव तिन देही पाई । करै भोग भौं में भरमाई ॥
सारा जग बेदन भरमैया । औतारी साँचे गोहरैया ॥
दीनदयाल पुरुष है न्यारा । निराकार काल के पारा ॥
निरंकार तह काल न जावै । वहँ की गम जोती नहिं पावै ॥
वो स्वामी है अगम अगाही । जह संतन ने सुरति समाई ॥
सुरति समाड़ पुरुष को देखा । मिला पुरुष गम अगम अलेखा ॥
उनका लेखा बेद न पावै । नेति नेति चारों गोहरावै ॥
पंचम बेद सुषम नहिं जाना । षष्ठम प्रसंग बेद कहै नाना ॥
चारि बेद पुनि गुप्त रहाई । तामें कागद लगै न स्याही ॥
तुम पुनि पुरुष भेद नहिं जाना । दसो बेद कहै नहिं पहिचाना ॥
दसो बेद से भेद न्यारा । पुरुष भेद नहिं पावै पारा ॥
निरंकार जोती नहिं जाना । जहँ पहुँचे कोड़ संत सुजाना ॥
तुलसी सैल सुरति से कीन्हा । पाया अगम गम्य का चीन्हा ॥