भारतकोश
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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पत्थर पानी दूर बहावा। तब घर अगम राह को पावा ॥
बेद कितेब पुरान उठाये। तब लिखि सुरति अगम को धाये ॥
नेम अचार चार नहीं माना। बोलै सब घट माहिं दिखाना ॥
बोल अबोल दोऊ के पारा। तहँवा तुलसी सुरति सवारा ॥
छर अच्छर निःअच्छर पारा। देखा तुलसी निरखि निहारा ॥
अगम अगाध पुरुष दरबारा। तुलसी मिलै सुरति की लारा ॥
तन में देखि ब्रह्मण्ड पसारा। सो हिये हेर सुरति की लारा ॥
हिये में हेर फोड़ ब्रह्मण्ड। हिये की लार सार नौखण्डा ॥
अंतर हेर हिये के माई। अंड फोड़ ब्रह्मण्ड दिखाई ॥
अंतर खोज कीन्ह हिये माई। अंतर हिये माहि दरसाई ॥
तन में तोड़ फोड़ हिये कीन्हा। अंतर सार हिये में चीन्हा ॥

दस औतार काल के भाई

दस औतार काल के भाई। तामें नरसिंह है दस माहीं ॥
हरनाकुस का उदर बिदारा। ये जानौ सब काल पसारा ॥
वे दयाल एक सब माहीं। वो कहौ केहि का मारन जाई ॥
हरनाकुस कौ मारि बिदारा। पुनि पहलाद राज बैठारा ॥
राज भोग जिन कीन्हा भाई। सो तेहि पुत्र बिलोचन राई ॥
वे लोचन केवलि भयौ सोई। जा को बावन बाँधे जोई ॥
जो मुक्ति वा की होड़ जाते। बली छुड़ावन केहि विधि आते ॥
आवागमन मुक्ति नहीं भाई। बली छुड़ावन कस कस आई ॥
भागवत में देखौ यह सारखी। बली काज आये अस भारखी ॥
जो पहलाद मुक्ति को जाता। आवागमन केहि कारन आता ॥
सहाय करी नरसिंह बतावा। पिता मारि राज जिन पावा ॥
राज करै सो नरकै जाई। कस कस ताकी मुक्ति बताई ॥
जो नरसिंध जिवत ले जाता। तौ ता की हम मानै बाता ॥
राज थापि तेहि भोग करावा। भोग भोग भौ खानै आवा ॥