भारतकोश
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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ताकी मुक्ति साखि बतलावौ। कहि झूठी झूठी समझावौ ॥
सुवा पढ़ावत गनिका तारी। सहजै होत जक्त सब मुक्ति ॥
सुवा सुवा घर घर में होते। तौ मुक्ति का सोच न करते ॥
धूू तप की तुम साखि बताई। गोपीचंद भरथरी भाई ॥
पढ़ पढ़ सुवा मुक्ति जो होते। तौ पुनि राज काहे को तजते ॥
धूू को तप की बिधि बताया। राज छाड़ि तन खाक मिलाया ॥
गनिका मुक्ति सहज बतलावौ। धूू जी राज गये किमि गावौ ॥
कभि सुवा पढ़ते सहज बतावा। कभि कभि कष्ट तपस्या गावा ॥
ये तौ बिधि मिली नहीं भाई। ये सब झूठ झूठ सी गाई ॥

काल के फंद की खबर नाहीं

अंध रे अंध संसार सब अंध है, काल के फंद की खबर नाहीं।
करत उन्माद विष स्वाद संसार का, मगन मस्तान है तासु माहीं ॥
नैन मद अंध अरु बैन मुख छार है, चलन गुमान में छाँह देखै ॥
कहैं कबीर नर नारि सब एक से, काल चपेट हैं नाहिं पेखै ॥

सारा संसार अंधा है। किसी को भी काल के जाल का पता नहीं है। सभी संसार के विषय-विकारों रूपी विष का सेवन कर पागल बने रहते हैं, जिसके फलस्वरूप उनकी विवेक की आँखें फूट चुकी हैं, मुख से कड़वी बातें ही निकलती रहती हैं। वो घमण्ड के साथ चलते हैं और समझते हैं कि वे सही दिशा में जा रहे हैं। साहिब कहते हैं कि स्त्री-पुरुष सब काल के जाल में फँसे हुए हैं और उसके जाल को समझ नहीं पा रहे हैं।

निरंजन ख्याल पसारा हो

सुनो कोई साधु प्रेम लगाय के, निरंजन ख्याल पसारा हो ॥
धरती आकाश रचा अमृत मण्डल, तीन लोक विस्तारा हो।