भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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भूमिका । १०५

विचित्रता' से अनेक रस ब्रह्म ( साकार ) के लिये है, परमार्थ में वह निर्विशेष ( निराकार ) ही है, इस सब सिद्धान्त को भगवान् वेदव्यास ने तृतीयाध्याय के दूसरे पाद में भली भांति कहा है, जिसके संग्राहक पूर्वपक्षसिद्धान्तरूप श्रीभारती तीर्थ के ये श्लोक हैं- 'ब्रह्म किं ? रूपि, वाऽरूपं, भवेन्नीरूपमेव वा । द्विविध-श्रुतिसद्भावाद् ब्रह्म स्याद्-उभयात्मकम् ॥ नीरूपमेव वेदान्तैः प्रतिपाद्यमपूर्वतः । रूपं त्वनूद्यते भ्रान्तम्, उभयत्वं विरुध्यते ॥' उक्त ब्रह्म की प्राप्ति में ज्ञान ही एक साधन है, ज्ञान के बिना ब्रह्म नहीं पहिचाना जाता, ब्रह्मलाभ-ब्रह्मदर्शन-ब्रह्म साक्षात्कार ज्ञानही से होता है; यही श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराण आदिकों का आदेश-उपदेश-सुभाषित-सारांश है। विवेक, वैराग्य, शम, दम, श्रद्धा, समाधान, उपराम, तितिक्ष- षाषट्क, मुमुक्षुता, श्रवण, मनन, निदिध्यासन और तत्त्वं पदार्थ- शोधन, ये आठ ज्ञान के अन्तरङ्ग साधन हैं और कर्म बहिरङ्ग साधन है। अत एव ब्रह्म (आत्मा) के साक्षात्कार में ज्ञान और कर्म का परमार्थदृष्टि से समुच्चय, वा विकल्प, वा अङ्गाङ्गि- भाव कथमपि नहीं है। उक्त विषय में कतिपय प्रमाण-वाक्य लिखते हैं- 'न कर्मणा न प्रजया धनेन-' 'नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा-' 'तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीराः-' इत्यादि श्रुति.