मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 108, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें१२०६ । मनुस्मृति । 'ज्ञानं निःश्रेयसं प्राहुर्दृढा निश्चयदर्शिनः । तस्माज्ज्ञानेन शुद्धेन मुच्यते सर्वपातकैः ॥' 'व्रतानि दानानि तपांसि यज्ञाः सत्यं च तीर्थाश्रमकर्मयोगाः । स्वर्गार्थमेवाशुभमध्रुवं च ज्ञानं ध्रुवं शान्तिकरं महार्थम् ॥' 'अर्थस्य मूलं निकृतिः क्षमा च कामस्य रूपं च वपुर्वयश्च । धर्मस्य यागादि दया दमश्च मोक्षस्य सर्वोपरमः क्रियाभ्यः ॥' इत्यादि स्मृति. किंबहुना, प्रतितन्त्र सांख्यदर्शन में भी कहा है कि— 'ज्ञानान्मुक्तिः । बन्धो विपर्ययात् । नियतकारणत्वाच्च समुच्चय-विकल्पौ । स्वप्नजागराभ्यामिव मायिका मायिकाभ्यां नोभयोर्मुक्तिः पुरुषस्य' (३ अध्याय २३-२६ सूत्र.) तथा भगवद्गीताभाष्य में भगवत्पाद ने भी केवल ज्ञान ही से मोक्षप्राप्ति कही है और अन्त में तात्पर्य-निर्णायक भाष्य में गीताशास्त्र का रहस्य दिखलाया है । प्रमाणवाक्य— 'तस्माद् गीतासु केवलादेव तत्त्वज्ञानान्मोक्षप्राप्तिः, न कर्म- समुच्चितादिति निश्चितोऽर्थः' । ऐसी दशा में भी ज्ञान कर्म की सहानुभूति के लिये श्रीभाष्य में यह एक अलौकिक कल्पना की है कि जैमिनि की द्वादशाध्यायी (पूर्वमीमांसा) अपने परिशिष्ट चतुरध्यायी (संकर्षणकाण्ड) के साथ षोडशाध्यायी बनती है, इस षोडशा- ध्यायी और वेदान्तचतुरध्यायी (ब्रह्मसूत्र) की जो एकविंशत्य-