भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 649 में से

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पृष्ठ 109

: भूमिका । १०७

ध्यायी ( १२ अध्याय पूर्वमीमांसा + ४ अध्याय संकर्षण- काण्ड + ४ अध्याय उत्तर मीमांसा=२० अध्याय ) बनती है। उसको एक शास्त्र मानना चाहिये । भला देखिये तो सही प्रवृत्ति निवृत्तिरूप धर्मों के भेद से जिज्ञासा के भेद होने पर भी उनके भिन्नप्रतिपादक शास्त्रों को एक बना देना कैसी उद्दण्डता है । कई एक वादी सविशेष ब्रह्म ( साकार ) ही को उपास्य मानते हैं निर्विशेष ब्रह्म ( निराकार ) को उपास्य नहीं बत- लाते परन्तु यह बात अविचारित रमणीय है । जब श्रुति स्मृतियों में दोनों की उपासना कही है तब एकही की उपा- स्यता क्यों ? अधिकारिभेद से दोनों की उपासना क्यों नहीं ? सविशेष ब्रह्म के नानात्व के कारण उसकी उपासना का भी नानात्व है अर्थात् ध्येयाकार के भेद से ध्याता के धारणा, ध्यान, समाधि ( संयम ) और उपचार भिन्न हैं, इधर अन्त में विशेषक-गुणों का उपसंहार मानकर निर्विशेष ही पर विश्राम होता है भलेही वह एक विषयक-विशेष ( आकार ) क्यों न हो, श्रुतिसिद्ध अव्याकृतावस्था तो शिर पड़ी है, इस कारण निर्विशेष ब्रह्म प्रधान है उसके एकत्व के कारण उसकी उपासना धारणा-ध्यान-समाधि एकाश्रित है, और ब्रह्म के निर्विशेषत्व का निरूपण करके उसके साक्षात्कार का मोक्ष- रूप फल इस सिद्धान्तश्रुति में प्रसिद्ध है- 'अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् । अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥' कठोपनिषद्.

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