भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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भूमिका । ११६ ' गुणिनस्तु गुणो यद्वद् गुणादेव गुणी यथा । एवं विशिष्टाद्वैतं हि श्रुतिस्मृत्युदितं नृप ॥ ८ ॥' बृहद्ब्रह्मसंहिता-रुद्रगीता. श्रीरामानुजाचार्य के विषय में कल्पक ने जो कुछ लिखा है सो सब 'यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं' के न्याय से माननीय है, परंतु द्वापरान्त और कलि के आदि में श्री ६ कृष्ण आदि की सत्ता में मनुष्यों का विधर्मी होना तथा उसी समय में वा उस के आसपास भी श्रीरामानुजाचार्य का अवतार लेना तथा श्रीशठकोप आदि का उनसे भी पूर्व विराजमान रहना तथा 'श्रुतिस्मृत्युदित' इस लेख के अनुसार 'विशिष्टाद्वैत' शब्द का आनुपूर्वीक न मिलना तथा वाल्मीकि-व्यास आदिकों के वचनानुसार विशिष्टाद्वैत प्रतिपाद्य ब्रह्मजीवैक्य के निरूपण को न पाना तथा अन्यान्य शङ्काओं का उठना-विचारशीलों के सामने उक्त प्रमाणों को अप्रामाणिक ठहराता है। श्रीरामानुजाचार्य जिनका दूसरा नाम लक्ष्मणाचार्य है,आपने अपने श्रीभाष्य में विशिष्टाद्वैत वादसे अतिरिक्त जो श्रीमद्ध्वाचार्य का द्वैतवाद, श्रीनिम्बार्काचार्यका द्वैताद्वैतवाद आदि हैं, उनका खण्डन किया है परंतु वे भी पारम्परिक-वैष्णवसंप्रदायसे सिद्ध हैं। १ विशिष्टं च विशिष्टं च विशिष्टे, विशिष्टयोरद्वैतं विशिष्टाद्वैतम् । अर्थात् अव्या- कृत नामरूप विशिष्टचिदचित्, व्याकृत नामरूपविशिष्ट चिदचित् । २ 'कपर्दिमतकर्दमे कपिलकल्पनावागुरां दुरत्ययमतीत्य तद् द्रुहिणतन्त्रयन्त्रोदरम् । कुदृष्टिकुहनामुखे निपततः परब्रह्मणः करग्रहविचक्षणो जयति लक्ष्मणोऽयं मुनिः॥' इति निगमन्तमहादेशिकाः । ३ 'कलौ प्रवृत्ते बौद्धादिमतं रामानुजं तथा । शाके चैकोनपञ्चाशदधिकान्दसहस्रके १०४६ ॥ निराकर्तुं मुख्यवपुं सन्मतस्थापनाय च । एकादशशते शाके ११०० विंशत्यष्टयुगे गते ॥ अवतीर्णं मध्वगुरुं सदा वन्दे महागुणम् ॥' .इति माध्वाः ।