मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
भूमिका । ११६ ' गुणिनस्तु गुणो यद्वद् गुणादेव गुणी यथा । एवं विशिष्टाद्वैतं हि श्रुतिस्मृत्युदितं नृप ॥ ८ ॥' बृहद्ब्रह्मसंहिता-रुद्रगीता. श्रीरामानुजाचार्य के विषय में कल्पक ने जो कुछ लिखा है सो सब 'यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं' के न्याय से माननीय है, परंतु द्वापरान्त और कलि के आदि में श्री ६ कृष्ण आदि की सत्ता में मनुष्यों का विधर्मी होना तथा उसी समय में वा उस के आसपास भी श्रीरामानुजाचार्य का अवतार लेना तथा श्रीशठकोप आदि का उनसे भी पूर्व विराजमान रहना तथा 'श्रुतिस्मृत्युदित' इस लेख के अनुसार 'विशिष्टाद्वैत' शब्द का आनुपूर्वीक न मिलना तथा वाल्मीकि-व्यास आदिकों के वचनानुसार विशिष्टाद्वैत प्रतिपाद्य ब्रह्मजीवैक्य के निरूपण को न पाना तथा अन्यान्य शङ्काओं का उठना-विचारशीलों के सामने उक्त प्रमाणों को अप्रामाणिक ठहराता है। श्रीरामानुजाचार्य जिनका दूसरा नाम लक्ष्मणाचार्य है,आपने अपने श्रीभाष्य में विशिष्टाद्वैत वादसे अतिरिक्त जो श्रीमद्ध्वाचार्य का द्वैतवाद, श्रीनिम्बार्काचार्यका द्वैताद्वैतवाद आदि हैं, उनका खण्डन किया है परंतु वे भी पारम्परिक-वैष्णवसंप्रदायसे सिद्ध हैं। १ विशिष्टं च विशिष्टं च विशिष्टे, विशिष्टयोरद्वैतं विशिष्टाद्वैतम् । अर्थात् अव्या- कृत नामरूप विशिष्टचिदचित्, व्याकृत नामरूपविशिष्ट चिदचित् । २ 'कपर्दिमतकर्दमे कपिलकल्पनावागुरां दुरत्ययमतीत्य तद् द्रुहिणतन्त्रयन्त्रोदरम् । कुदृष्टिकुहनामुखे निपततः परब्रह्मणः करग्रहविचक्षणो जयति लक्ष्मणोऽयं मुनिः॥' इति निगमन्तमहादेशिकाः । ३ 'कलौ प्रवृत्ते बौद्धादिमतं रामानुजं तथा । शाके चैकोनपञ्चाशदधिकान्दसहस्रके १०४६ ॥ निराकर्तुं मुख्यवपुं सन्मतस्थापनाय च । एकादशशते शाके ११०० विंशत्यष्टयुगे गते ॥ अवतीर्णं मध्वगुरुं सदा वन्दे महागुणम् ॥' .इति माध्वाः ।
आचार्य दूसरे के मत का खण्डन करके अपने मन्तव्य को
१२० मनुस्मृति। प्रमाण में उनके भाष्यादि साधन मौजूद हैं और जब एक आचार्य दूसरे के मत का खण्डन करके अपने मन्तव्य को स्थिर करते हैं तब स्पष्ट है कि उनका परस्पर में मतभेद है ऐसी दशा में कौन मत सर्वोत्तम माना जावे ? इनसे अति- रिक्त श्रीचैतन्यमहाप्रभु श्रीस्वामिनारायण आदिके मत हैं जो अब सज्जित होरहे हैं । प्रासङ्गिक श्लोक याद आता है- ‘ एकस्यैव महेश्वरस्य निगमे कृष्णादिरूपश्रुतौ सिद्धायामपि भेदवादनिपुणाः स्वस्वार्थनिष्पत्तये । वेदान्तान् परिवर्त्य शास्त्रवचनान्युन्मथ्य नानाशयै- र्भेदान् वैष्णवमण्डलेऽप्यजनयन्शैवादिवार्तैव का ॥’ किं बहुना, उपास्य ( ध्येयाकार ) भेद, मन्त्रभेद, तिलक भेद, अङ्कनभेद, मालाभेद, एकादशी आदि व्रतभेद, आचारभेद ने वर्णाश्रमशृङ्खला को शिथिल करदिया, शिथिल तो कलि ने किया पर ये सब भी निमित्त कारण हुए और बहुधा आकार के भेद न होने पर भी शैवापसदों से भी वर्णाश्रमाचार को धक्का ही पहुँचा । इधर दुराग्रही वैष्णवों का १ आप का अवतार बङ्गाल में हुआ है । २ आपकी जन्मभूमि अयोध्यामण्डल और विकासभूमि गुर्जरमण्डल है । ३ अरुणोदयवेध, प्राक्कापालिकवेध । एकादशी सर्वमान्य व्रत है पर इसका अत्याचार दो देशों में अधिक देखा जाता है । एक वङ्ग में, जहां अदीक्षित बाल- विधवा भी एकादशी के घोर नियमों से मृतप्राय करडाली जाती हैं । धन्य हैं वङ्गपण्डित महाशय । दूसरे अयोध्याप्रान्त में किती किसी स्थान पर एकादशी के दिन हाथी घोड़े दाना नहीं पाते । ४ अपने अपने मतानुसार दीक्षा पाये हुए शूद्रों के स्पृष्ट पक्वान्न तक के ग्रहण में परहेज न होगा परंतु अदीक्षित वैदिक ब्राह्मण के स्पर्श किये हुए जल का भी ग्रहण न किया जायगा ......।
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ऐसा विष्णुभक्ति में अभिनिवेश न रहा जैसा कि शिवद्रोह करने कराने में अभिनिवेश फैला, उधर दुराग्रही शैवों का भी यही प्रकार बढ़ा, दोनों वर्गों में मनमानी लौकिकी भक्तिही की घमाशानी उठी और सब भक्ति के प्रकार भूल गये इसी लौकिक-भक्ति के आडम्बर से भारत के अज्ञान नरनारी को मोहित कर अपने अपने वर्ग की वृद्धि करने लगे........। यह कथन उन महात्माओं वा उनके अनुयायियों के लिये है जो वर्णाश्रम-शृङ्खला को घसीटते हुए अत्याचार कर रहे हैं। जो कोई अपने को अतिवर्णी वा अत्याश्रमी मानते हैं और वैसाही बर्ताव करते हैं उनके लिये यह कोई कथन वा आक्षेप नहीं है, न हो सकता है। किं बहुना, अधिकारी ही कहे जाते हैं- 'ये ये हि वर्णाश्रमधर्मनिष्ठास्तानेव तानेव विशिष्यशिष्मः । ये केऽपि वर्णाश्रमबाह्यवृत्तास्तान्वेश्महे वक्तुमहानि षिष्मः ॥' मुक्तक.
भगवान् मनु और मनुस्मृति । पहले स्मृतियों की गणना होचुकी है उन सब स्मृतियों में मनुस्मृति ही प्रधान मानी जाती है । इसीकी सहानुभूति से अन्यान्यस्मृतियां प्रामाणिक गिनी जाती हैं। इसके बारे में वृहस्पति ने तो यह कहा है कि मनु से विरुद्ध जो कोई स्मृति है उसका प्रमाण ही नहीं है- ' वेदार्थोपनिबन्धत्वात् प्रामाण्यं हि मनोः स्मृतम् । मन्वर्थविपरीता तु या स्मृतिः सा न शस्यते ॥' ऐसा क्यों न कहा जाय, जब स्मृतियों की मूलभूत श्रुतियों ही में मनु के उपदेश की प्रशंसा प्राप्त होती है-
१२२ मनुस्मृति । 'मनुर्वै यत्किंचिदवदत्तद्भेषजं भेषजतायाः ।' अर्थात् मनु ने जो कुछ कहा है वह सब औषध के तुल्य ग्राह्य है उस बारे में कुतर्क करने का अवकाश नहीं है । भारत में भी कहा है कि- 'पुराणं मानवो धर्मः साङ्गो वेदश्चिकित्सितम् । आज्ञासिद्धानि चत्वारि न हन्तव्यानि हेतुभिः ॥' यहां पुराण से वेदार्थसंवादी पुराणभाग का ग्रहण इष्ट है और जब सांख्ययोग आदि परिच्छिन्न-दर्शन का ही निरंकुश प्रामाण्य नहीं है तो अपरिच्छिन्न पुराणों का निरंकुश प्रामाण्य होना कैसे संभव है ? यह बात वैयासिक ब्रह्मसूत्रों से भी स्पष्ट है किंबहुना-पदार्थसंशय में साधुदृष्टि से अनूचान-विद्व- ज्जन पूर्वोत्तरमीमांसा के अनुसार प्रमेय परीक्षा कर सकते हैं, यह बात मनुस्मृति से भी स्पष्ट जानी जाती है । परंतु फिरभी 'ऐकोऽप्यध्यात्मवित्तमः' की आवश्यकता पड़ती है, यह १ 'मनोर्ऋचः सामधेन्यो भवन्ति' इत्यस्य विधेर्वाक्यशेषे श्रूयते । २ 'सयथार्द्रैधाग्नेरभ्याहितस्य पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसइतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानानि-' श० प० कां० १४ अ० ६ ब्रा० ६ कं० ११ । ३ । यद्यपि पुराण परिच्छिन्न है तो भी साधन के दौर्बल्य से अपरिच्छिन्न कहना पड़ा । ४ परपक्षनिराकरण-रीति के अनुसार । ५ गुरुमुख से वेदवेदाङ्ग पढ़े हुए । ६ ' विरोधेत्वनपेक्ष्यं स्यादसतिह्यनुमानम्' पू० मी० १ अ० ३ पा० ३ सू० 'स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्ग इति चेन्नान्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गात्' उ० मी० २ अ० १ पा० १ सू० । ७ याज्ञवल्क्यस्मृति ।
बात औपनिषद् कथाभाग से भी स्पष्ट है । वर्तमान काल में तो हम सब अध्यात्मवित्त्तम होरहे हैं । मनुस्मृति के प्रत्येक अध्यायोंके अन्त में ‘भृगुप्रोक्तायां संहि- तायां’ ऐसा लेख प्राप्त होताहै उसे देखकर संदेह होताहै कि यह मनुस्मृति साक्षात् मनु की निर्मित न होगी, उसका यह तात्पर्य है कि जैसे वेदव्यास ने भगवान् श्रीकृष्ण-अर्जुन के संवाद को सात सौ श्लोकों में यथार्थ संकलित किया और उसका नाम भगवद्गीता हुआ वह भगवान् की साक्षात् उक्ति (उपदेश) होने के सबव भगवान् श्रीकृष्ण की ही बनाई मानी गई-इसी प्रकार भगवान् मनुसे सारे धर्मों को महर्षि भृगु पढ़कर मनुही की आज्ञा से ऋषियों को पढ़ाया और उसको लोकोपकार के लिये श्लोकबद्ध कर दिया वही स्मृति ‘मनुस्मृति’ नाम से लोक में विख्यात हुई। यह कथाभाग भी मनुस्मृति के प्रथमाध्याय के (५६-६०, तथा ११६) इन श्लोकों में लिखा हुआ है। और मनु से साक्षात् अथवा शिष्यपरम्परा द्वारा समय समय पर अन्यान्य ऋषियों को जो धर्म ज्ञात हुए उनका उल्लेख भी मनु के नाम से अन्यस्मृतियों में आया करता है। जैसा पाराशरस्मृति में- ‘अग्निरापश्च वेदाश्च सोमसूर्यानिलास्तथा । एते सर्वेऽपि विप्राणां श्रोत्रे तिष्ठन्ति दक्षिणे ॥ ३६ ॥ प्रभासादीनि तीर्थानि गङ्गाद्याः सरितस्तथा । विप्रस्य दक्षिणे कर्णे सांनिध्यं मनुरब्रवीत् ॥ ४० ॥’ ‘मनुना चैवमेकेन सर्वशास्त्राणि जानता । प्रायश्चित्तं तु तेनोक्तं गोघ्नश्चान्द्रायणं चरेत् ॥ ४१ ॥’ भगवान् वाल्मीकि ने भी ‘शासनाद्-८ । ३१६’ ‘राज-
निर्धूतदण्डास्तु-८ । ३१= ' इन मानव श्लोकों को रामायण
१२४ मनुस्मृति । निर्धूतदण्डास्तु-८ । ३१= ' इन मानव श्लोकों को रामायण में उद्धृत किया है- ' श्रूयते मनुना गीतौ श्लोकौ चारित्रवत्सलौ । गृहीतौ धर्मकुशलैस्तथा तच्चरितं मया ॥ ३० ॥ राजभिर्धूतदण्डाश्च कृत्वा पापानि मानवाः । निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ ३१ ॥ शासनाद्वापि मोक्षाद्वा स्तेनः पापात्प्रमुच्यते । राजा त्वशासत् पापस्य तदवाप्नोति किल्विषम् ॥ ३२ ॥' रामायण किष्किन्धाकाण्डवालिवध. कालवश किंचित् पाठभेद होगया है परंतु अर्थ एकही है। देखिये बड़े संतोष की वार्ता है कि-वही यह मनुस्मृति है जो कि वाल्मीक के समय में प्रचलित थी। मूल वाक्यों के ढूंढने में बड़ा क्लेश उठाना पड़ता है तो भी सफलता नहीं प्राप्त होती, कैसी सुविधा होती, यदि धर्मानुरागी प्रेसस्वामी स्मृति-इतिहास-पुराणों की अकारादि अनुक्रमणी भी छपा डालते, उस दशा में थोड़े प्रयास से भी बहुत कुछ सुधार की आशा थी.... ... । पहिले मनु के विषय में श्रुति लिखी है उसको देखने से यह शंका उत्पन्न होती है-मनु एक अनित्य पुरुष हैं जिसकी चर्चा श्रुति में आई है इस कारण मनु से पीछे की बनी श्रुति क्यों न हो ? इस शंका का समाधान मीमांसादर्शन के तन्त्र- वार्तिक में जो लिखा है उसका यह सारांश है-जैसे यज्ञ में १ ' वेदाङ्गोपाङ्गशास्त्राणां वर्णादिक्रमसूचना । मौलिकैः सह संवादो विद्याशोधनमुच्यते ॥' द्विवेदी.
भूमिका । १२५ अध्वर्यु आदि किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं है किन्तु ऋत्विजों की उपाधि (पदवी) है; इसी प्रकार मनु (स्वायं- भुव-वैवस्वत आदि) भी किसी एक व्यक्ति की संज्ञा नहीं है किंतु ब्रह्मा के दिन में एकहत्तर महायुगपर्यन्त प्रजापालन करनेवाले अधिकारी की पदवी है। प्रमाणवचन- 'न वैतच्छ्रुतिसामान्यमात्रं नित्येऽपि संभवात् । यज्ञेऽध्वर्युरिव ह्यस्ति मनुर्मन्वन्तरे सदा ॥ प्रतिमन्वन्तरं चैवं श्रुतिरन्या विधीयते । स्थिताश्च मनवो नित्यं कल्पे कल्पे चतुर्दश ॥ तेन तद्वाक्यचेष्टानां सर्वदैवास्ति संभवः । तदुक्तिज्ञापनाद् वेदो नानित्योऽतो भविष्यति ॥ प्रतियज्ञं भवन्त्यन्ये षोडश षोडशर्त्विजः । आदिमत्त्वं च वेदस्य न तच्चरितबन्धनात् ॥' इत्यादि ।
श्लोक वाल्मीकीय-रामायण में भी प्राप्त हैं (देखिये भूमिका
मनुस्मृति में क्षेपक की आशङ्का— 'मनुस्मृति' अत्यन्त प्राचीन स्मृतिशास्त्र है । जिसके श्लोक वाल्मीकीय-रामायण में भी प्राप्त हैं (देखिये भूमिका पृष्ठ १२४ ) -और- अन्यान्य स्मृतिग्रन्थों में भी मिलते हैं (देखिये भू० १२३) और धर्माब्धिसार-स्मृतिचन्द्रिका-हेमाद्रि- पराशरमाधव-स्मृतिरत्नाकर-मिताक्षरा-निर्णयसिन्धु-संस्कार- कौस्तुभ आदि ग्रन्थों में 'मनु' के नाम से जो कतिपय श्लोक लिखे हैं वे मनुस्मृति में नहीं उपलब्ध होते हैं देखिये मण्ड- लीक संगृहीत (मनुस्मृति परिशिष्ट) उसका कारण उक्तप्राय है (देखिये भू० १२३) इस दशा में विप्रकीर्ण मानववाक्य विरोधी होनेपर चिन्तनीय हैं, न कि सहसा उनकी अप्रमा- णिकता सिद्ध होसकती है यह 'मनुस्मृति' (इसकी श्लोक- संख्या विषय संकलन में स्पष्ट है) अत्यन्त प्रामाणिक है, इसमें क्षेपक का गन्धमात्र नहीं है इसके ऊपर अनेक टीकायें हुई हैं जिनमें मेधातिथि, सर्वज्ञनारायण, गोविन्दराज, कुल्लूक, राघवानन्द, नन्दन और रामचन्द्र की बनाई टीकायें सुप्रसिद्ध हैं । इस दशा में भी इस 'मनुस्मृति' में वही लोग क्षेपक कह सकते हैं जो वैदिकरहस्य नहीं जानते हैं, अथवा जो कोई
'मनु ५ अध्याय ५६ श्लोक.
मनुस्मृति में क्षेपक की आशङ्का । १२७ शब्दतः किंवा अर्थतः वेद के कण्टक हैं। यहां एक सुप्रसिद्ध उदाहरण दिखलाया जाता है- ‘ न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने । प्रवृत्तिरेषां भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला ॥ ’ 'मनु ५ अध्याय ५६ श्लोक. इसको प्रायः क्षेपक बतलाया करते हैं, पर यह श्लोक उक्त सातों टीकाओं में व्यवस्था के साथ व्याख्यात हुआ है तब कैसे क्षेपक होसकता है ? श्रीमद्भागवत में भी इसकी यों व्यवस्था लिखी है- 'लोके व्यवायामिषमद्यसेवा नित्यास्तु जन्तोर्नहि तत्र चोदना । व्यवस्थितिस्तत्रविवाहदीक्षा- सुराग्रहैरासुर्निवृत्तिरिष्टा ॥ 'इत्यादि. ११ स्कं० ५ अध्याय ११ श्लोक. इस प्रकार, पूज्यपाद श्री ६ द्विवेदीजी की धर्मसंहिता के आधार पर, यह मानवधर्मशास्त्र की भूमिका लिखी गई है। इसमें वैदिक सनातन धर्मादि का विवेचन निष्पक्षपातभाव से श्रुति-स्मृति के प्रमाणोंद्वारा जिस प्रकार किया गया है, उसका महत्त्व विद्वानों कोही यथार्थरूप से ज्ञात.होगा, क्योंकि ‘ वेत्ति विश्वम्भरा भारं गिरीणां गरिमाश्रयम् ’ कालगति से धर्मादि में चाहे जितना विपर्यय और विप्लव हो, परन्तु सत्य का लोप होना सर्वथा असम्भव है, और उसकी मर्यादा सर्वदा अजरा- मर ही रहेगी । जगत् का प्रवाह तो सदा से ही नियन्त्रित चला आता है ।
महाकवि श्रीभवभूति का श्लोक निर्मत्सर-शुद्धान्तःकरण विवेक-
१२८ मनुस्मृति । अन्त में, भगवान् सत्यरूप धर्म का जय जयकार-पूर्वक महाकवि श्रीभवभूति का श्लोक निर्मत्सर-शुद्धान्तःकरण विवेक- शील-महानुभाव विद्वानों को सुनाकर वक्तव्य पूर्ण करता हूं । ‘ये नाम केचिदिह नः प्रथयन्त्यवज्ञां, जानन्ति ते किमपि तान्प्रति नैष यत्नः । उत्पत्स्यतेऽस्ति मम कोऽपि समानधर्मा, कालोह्ययं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी ॥’ इति । ॐ शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः । नवलकिशोर विद्यालय गोमती तट, लक्ष्मणपुरी, } गिरिजाप्रसाद द्विवेदी । मार्गशीर्ष शुक्ल ५ गुरुवार सं० १९७३
१ । आचारकाण्ड-
मनुस्मृति के विषयों का संकलन॑ । १ । आचारकाण्ड- आरम्भ=मनु १-४ श्लोक, १ अ० । स्थूल और सूक्ष्मसृष्टि=आसीत् ५-५७ श्लो०, १ अ० । ६१-८४ श्लो०, १ अ० । ८७ श्लो० १ अ० । शास्त्र का प्रचार=इदं ५८-६० श्लो० १ अ० । ११६ श्लो० १ अ० । शास्त्रकी प्रशंसा=तस्य १०२-११० श्लो० १ अ० । ( आचार माहात्म्य ) शास्त्र के विषय । सूची=जगतः १११-११८ श्लो० १ अ० । शास्त्र के अधिकारी=निषेक १६ श्लो० २ अ० । अप्रामाणिक शास्त्र=या ६५-६६ श्लो० १२ अ० । धर्मपीठिका=विद्वद्भिः १-५ श्लो० २ अ० । धर्म=वेदो ६-१५ श्लो० २ अ० । ( धर्म में प्रमाण ) १७०-१७६ श्लो० ४ अ० । २३८-२४३ श्लो० ४ अ० । १५-१७ श्लो० ८ अ० । ( वृषलशब्द की निरुक्ति ) ८५-८६ श्लो० १ अ० । ६१-६३ श्लो० ६ अ० । ( धर्म के दश लक्षण ) ६३ श्लो० १० अ० । ( साधारण धर्म ) ६३ श्लो० १० अ० । १ स्मृतियों में गृह्यकर्म का उद्देश्यमात्र होता है, यदि उनका अनुष्ठान जानना हो तो अपने शाखासूत्र को देखना चाहिये । जैसा कि मनु का सूत्र कृष्ण- यजुर्वेदीय-मैत्रायणी शाखा का मानवगृह्यसूत्र है ।
१३० मनुस्मृति । धार्मिक सभा=नैश्रेयस १०७-११७ श्लो० १२ अ० । १०५-१०६ श्लो० १२ अ० । (धर्मशास्त्री होने की योग्यता) आचार=श्रुति १५५-१५८ श्लो० ४ अ० । (धर्ममूल) यज्ञिय देश=सरस्वती १७-२५ श्लो० २ अ०। (देशविभाग) अपवित्र देश=शनकैः ४३-४४ श्लो० १० अ० । ब्राह्मणजाति=ऊर्ध्वं ९२-१०१ श्लो० १ अ० । ब्राह्मण के कर्म=अध्यापन ८८ श्लो० १ अ० । ७४-७६ श्लो० १० अ० । ब्राह्मण का महत्त्व=ब्राह्मस्य १५०-१५६ श्लो० २ अ० । (दृष्टान्त) १८३-१८६ श्लो० ३ अ०। ३१३-३२१ श्लो० ९ अ० । (दृष्टान्तगर्भ उक्ति) ३५ श्लो० ११ अ० । ३ श्लो० १० अ० । ब्राह्मण के धर्म=संमानात् १६२-१६३ श्लो० २ अ०। १६७ श्लो० २ अ० । १-१७ श्लो० ४ अ० । ३३-३६ श्लो० ४ अ० । ८०-८१ श्लो० ४ अ० । (शूद्र को उपदेश का निषेध) ८४-९१ श्लो० ४ अ०। ११०-१११ श्लो० ४ अ० । ११७ श्लो० ४ अ० । १८६-१८७ श्लो० ४ अ० । (प्रतिग्रह का निषेध) २०५-२०६ श्लो० ४ अ० । (भोजन का निषेध) २४७-२५२ श्लो० ४ अ० । १०६-११४ श्लो० १० अ० । २४-२५ श्लो० ११ अ० । (यज्ञ के लिये धन मांगकर उसका शेष रखने से ब्राह्मण काक होता है) ३८-४३ श्लो० ११ अ० । ब्राह्मण के आपद्धर्म=नाद्याद् २२३ श्लो० ४ अ०। ८१-६३
[Page Header] विषयों का संकलन । १३१
श्लो० १० अ० । १०१-१०४ श्लो० १० अ० । ( अजीगर्त, वामदेव, भरद्वाज, और विश्वामित्र का दृष्टान्त ) १६-१७ श्लो० ११ अ० । ब्राह्मण के भक्ष्याभक्ष्य=मत्त २०७-२२२ श्लो० ४ अ० । ६६ श्लो० ११ अ० । अयोग्य ब्राह्मण=न तिष्ठति १०३ श्लो० २ अ० । ११८ श्लो० २ अ० । १६८ श्लो० २ अ० । ३६-३७ श्लो० ११ अ० । मूर्ख ब्राह्मण=यथा १५७-१५८ श्लो० २ अ० । १३२-१३३ श्लो० ३ अ० । १८८-१६१ श्लो० ४ अ० । क्षत्रियजाति=प्रजानां ८६ श्लो० १ अ० । ७७ श्लो० १० अ० । ७९-८० श्लो० १० अ० । ११७ श्लो० १० अ० । वश्यजाति=पशूनां ६० श्लो० १ अ० । ३२६-३३३ श्लो० ६ अ० । ७८ श्लो० १० अ० । ६८ श्लो० १० अ० । शूद्रजाति=एकमेव ६१ श्लो० १ अ० । १३६-१४० श्लो० ५ अ० । ३३४-३३५ श्लो० ६ अ० । ६६-१०० श्लो० १० अ० । १२१-१३१ श्लो० १० अ० । २५३-२५६ श्लो० ४ अ० । ब्रह्मचारी=उप ६६ श्लो० २ अ० । १०६-११६ श्लो० २ अ० । ( योग्य को पढ़ाना ) १४०-१४४ श्लो० २ अ० । ( आचार्य आदि नाम ) १४७-१४६ श्लो० २ अ० । ब्रह्मचारी के धर्म=अध्येष्य ७०-८७ श्लो० २ अ० । ( गायत्री के बिना ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यों की निन्दा ) १०१- १०८ श्लो० २ अ० । १५६-१६१ श्लो० २ अ० ।
१३२ मनुस्मृति । १६४-१६६ श्लो० २ अ० । १६६-२२३ श्लो० २ अ० । १-३ श्लो० ३ अ० । ६५-१२७ श्लो० ४ अ० । ८८ श्लो० ५ अ० । १५६ श्लो० ५ अ० । गृहस्थ=यथा ७७-८० श्लो० ३ अ० । ८७-६० श्लो० ६ अ० । ६३-६६ श्लो० ३ अ० । १-२ श्लो० १० अ० । ११५-११६ श्लो० १० अ० । २८-३० श्लो० ११ अ० । वर्णधर्म ( संस्कार ) =वैदिकैः २६-६८ श्लो० २ अ० । आह्निक ( दिनचर्या ) =वैवाहिके ६७-७६ श्लो० ३ अ० । ८१-१२१ श्लो० ३ अ० । ४५-५२ श्लो० ४ अ० । ६२-६४ श्लो० ४ अ० । २०१-२०३ श्लो० ४ अ० । १३२-१३६ श्लो० ५ अ० । स्नातक और गृहस्थ के धर्म=धर्मार्था २२४-२४० श्लो० २ अ० । ४५-५० श्लो० ३ अ० । १८-३२ श्लो० ४ अ० । ३७-४४ श्लो० ४ अ० । ५३-७६ श्लो० ४ अ० । ८२-८३ श्लो० ४ अ० । १२८-१५३ श्लो० ४ अ० । १५६-१६६ श्लो० ४ अ० । १७५- १८५ श्लो० ४ अ० । १६२-२०४ श्लो० ४ अ० । २२४-२३७ श्लो० ४ अ० । २४४-२४६ श्लो० ४ अ० । २५७-२६० श्लो० ४ अ० । ६-१० श्लो० ११ अ० । सन्मान=लौकिकं ११७ श्लो० २ अ० । ११६-१३६ श्लो० २ अ० । १४५-१४६ श्लो० २ अ० । १५४ श्लो० ४ अ० । आपत्काल=शस्त्रं ३४८-३५१ श्लो० ८ अ० । ३१-३४ श्लो०
विषयों का संकलन । १३३ ११ अ० । ( खुशामद से आपद् को दूर करना ब्राह्मण के लिये मना है ) विवाह = चतुर्णां २०-२१ श्लो० ३ अ० । २२-४४ श्लो० ३ अ० । ५१-५४ श्लो० ३ अ० । ४७ श्लो० ६ अ० । वर के धर्म = गुरुणा ४-१६ श्लो० ३ अ० । कन्या के धर्म = त्रीणि ६०-६२ श्लो० ६ अ० । विवाह के नियम = दारा १७१-१७२ श्लो० ३ अ० । १६७-१६६ श्लो० ५ अ० । २०४-२०५ श्लो० ८ अ० । २२४-२२७ श्लो० ८ अ० । ( वेदमन्त्र से कन्याही की विवाहविधि है-अकन्या की नहीं ) ६६-७३ श्लो० ६ अ० । ८८-८६ श्लो० ६ अ० । ६३-१०० श्लो० ६ अ० । ८०-८३ श्लो० ६ अ० । १७५-१७६ श्लो० ६ अ० । ५ श्लो० ११ अ० । पुत्रिकाकरण = अपुत्रो १२७-१२६ श्लो० ६ अ० । ( दक्षका दृष्टान्त ) १३६-१४० श्लो० ६ अ० । स्त्री = पितृभिः ५५-६२ श्लो० ३ अ० । १-२५ श्लो० ६ अ० । ( वसिष्ठ, अक्षमाला का और मन्दपाल, शारङ्गी का दृष्टान्त ) २६-४६ श्लो० ६ अ० । ४८-५६ श्लो० ६ अ० । ( बीज और योनि ) ७४-७६ श्लो० ६ अ० । १७७-१७८ श्लो० ११ अ० । स्त्री के धर्म = बालया १४६-१५८ श्लो० ५ अ० । १६०-१६६ श्लो० ५ अ० । ८४-८७ श्लो० ६ अ० । स्त्री पुरुष के धर्म = अन्यो १०१-१०२ श्लो० ६ अ० । स्त्री का नियोग = भ्रातुः ५७-६८ श्लो० ६ अ० । ( ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यों में नियोग का निषेध )
१३४ मनुस्मृति। पुत्र=पुत्रेण १३७-१३८ श्लो० ९ अ० । १८२-१८३ श्लो० ९ अ० । १५८-१८१ श्लो० ९ अ० । जाति और जीवन=ब्राह्मणः ४-६२ श्लो० १० अ० । ६४-७३ श्लो० १० अ० । (बीज और क्षेत्र) श्राद्ध=पितृयज्ञं १२२-२८६ श्लो० ३ अ० । द्विजातियों के भक्ष्याभक्ष्य=श्रुत्वैता १-२५ श्लो० ५ अ० (अगस्त्य का दृष्टान्त) मांस का निषेध=एतदुक्तं २६-५६ श्लो० ५ अ० । पदार्थों की शुद्धि=तैजसानां ११०-१३१ श्लो० ५ अ० । धर्मभिक्षुक=सांतानिकं १-४ श्लो० ११ अ० । ११-१६ श्लो० ११ अ० । १८-२३ श्लो० ११ अ० । २। व्यवहारकाण्ड- राजा का महत्त्व=राज १-१३ श्लो० ७ अ०। ३०१-३०२ श्लो० ९ अ० । राजा के धर्म=तस्या २६-४० श्लो० ७ अ० । ४१-४२ श्लो० ७ अ० । (राजाओं के दृष्टान्त) ४३-५३ श्लो० ७ अ० । ७७-८६ श्लो० ७ अ० । ९६-११२ श्लो० ७ अ० । १४५-१६६ श्लो० ७ अ० । २१२-२२६ श्लो० ७ अ० । १७२-१७५ श्लो० ८ अ० । ३६५ श्लो० ८ अ० । ३०० श्लो० ९ अ० । ३०३-३१२ श्लो० ९ अ० । ३२२-३२५ श्लो० ९ अ० । राज्यप्रबन्ध=मौलान् ५४-७६ श्लो० ७ अ० । १४१-१४४ श्लो० ७ अ० । ११३-१२६ श्लो० ७ अ० । २७-४१ श्लो० ८ अ० । ३८६-३८७ श्लो० ८ अ०। २६४-२६९ श्लो० ९ अ० ।
[Header] विषयों का संकलन । १३५ राज्यकर=क्रय १२७-१४० श्लो० ७ अ० । ३६४ श्लो० ८ अ० । ४०४-४०६ श्लो० ८ अ० । ११८-१२० श्लो० १० अ० । संग्राम=समो ८७-६८ श्लो० ७ अ० । १७०-२११ श्लो० ७ अ०। ऋण=व्यवहारान् १-१४ श्लो० ८ अ० । ( व्यवहार के १८ स्थान ) १८-२६ श्लो० ८ अ० । ४२-११२ श्लो० ८ अ० । ( राजा पैजवन के पास वसिष्ठ का शपथ ) ११३-१२३ श्लो० ७ अ० । ( वत्स का शपथ ) १४०-१७१ श्लो० ८ अ० । १७६-१७८ श्लो० ८ अ० । निक्षेप=कुलजे १७६-१८६ श्लो० ८ अ० । परधनविक्रय=विक्रीणीते १६७-२०३ श्लो० ८ अ० । संभूयकर्मकारी (साझेदार)=ऋत्विक २०६-२१३ श्लो० ८ अ० । वेतन=दत्तस्यै २१४-२१७ श्लो० ८ अ० । मर्यादाभेदन=एष २१८-२२१ श्लो० ८ अ० । क्रीतपरावर्तन=क्रीत्वा २२२-२२३ श्लो० ८ अ० । २२८ श्लो० ८ अ० । पशुस्वामिपाल=पशुषु २२६-२४४ श्लो० ८ अ० । सीमा ( हद ) = सीमा २४५-२६५ श्लो० ८ अ० । वाक्पारुष्य (कठोर वचन)=एषो २६६-२७७ श्लो० ८ अ० । दण्डपारुष्य ( प्रहार ) = एष २७८-३०० श्लो० ८ अ० । चौर्य ( चोरी ) = एषो ३०१-३३१ श्लो० ८ अ० । ३३३- ३४७ श्लो० ८ अ० । ( अपराधी पिता आचार्य आदि भी दण्ड्य कहे हैं ) साहस ( डकैती आदि ) = स्यात् ३३२ श्लो० ८ अ० । व्यभिचार=पर ३५२-३८५ श्लो० ८ अ० ।
१३६ मनुस्मृति । द्यूत ( जुआ )=अथ २२०-२२८ श्लो० ८ अ० । दण्ड का महत्त्व और विधान=ब्रह्म १४-२५ श्लो० ७ अ०। १२४-१३६ श्लो० ८ अ० । ३८८-३६३ श्लो०- ८ अ० । ३६६-४०३ श्लो० ८ अ० । ४१०-४२० श्लो० ८ अ० । २२६-२६३ श्लो० ९ अ० । ६६ श्लो० १० अ० । भ्रातृभाग=एष १०३-११७ श्लो० ९ अ० । ११९-१२६ श्लो० ९ अ० । २०४-२१६ श्लो० ९ अ० । २१८-२१६ श्लो० ९ अ० । पुत्रभाग=पुत्रिकायां १३४-१३६ श्लो० ९ अ० । १४१-१४२ श्लो० ९ अ० । १४५-१४७ श्लो० ९ अ० । १८४ श्लो० ९ अ० । एकयोनिजपुत्रभाग=एतद्विधानं १४८-१५७ श्लो० ९ अ० । भगिनीभाग=स्वेभ्यो ११८ श्लो० ९ अ० । निरंश=अनियुक्ता १४३-१४४ श्लो० ९ अ० । २०१-२०३ श्लो० ९ अ० । अपुत्रधनभाग=यथैवात्मा १३०-१३३ श्लो० ९ अ० । १८५-१६१ श्लो० ९ अ० । २१७ श्लो० ९ अ० । स्त्रीधनभाग=जनन्यां १६२-२०० श्लो० ९ अ० । ३ । प्रायश्चित्तकाण्ड- प्रेतशुद्धि=प्रेत ५७-६० श्लो० ५ अ० । ६४-७३श्लो० ५ अ० । वैदेशिक प्रेतशुद्धि=संनिधा ७४-७८ श्लो० ५ अ० । जन्मशुद्धि=यथेदं ६१-६३ श्लो० ५ अ० । जन्म-मरणशुद्धि=अन्तः ७९ श्लो० ५ अ० । आचार्यादिमरणशुद्धि=त्रिरात्र ८०-८२ श्लो० ५ अ० ।
विषयों का संकलन । १३७ शुद्धिदिन=शुद्धयेत् ८३ श्लो० ५ अ० । ( वर्तमानकाल में वर्णानुसार शुद्धि की व्यवस्था न रहने से दूसरी जाति में घुसने के लिये बड़ी सुविधा हुई ) शुद्धिविशेष=न ८४-८८ श्लो० ५ अ० । ६१ श्लो० ५अ०। प्रेतक्रियानिषेध=वृथा ८९-९० श्लो० ५ अ० । शवनिर्हरणद्वार=दक्षिणेन ९२ श्लो० ५ अ० । सद्यः शौच=न ९३-९६ श्लो० ५ अ० । असपिण्ड-प्रेतशुद्धि=एतद्भो १००-१०४ श्लो० ५ अ० । शुद्धि-हेतु=ज्ञानं १०५ श्लो० ५अ०। १०७-१०९ श्लो० ५अ०। अर्थशौच=सर्वेषा १०६ श्लो० ५.अ० । नानाविधशौच=१४१-१४५ श्लो० ५ अ० । प्रायश्चित्त=अकुर्वन् ४४-४७ श्लो० ११ अ० । महापातकादि=ब्रह्म ५५-७२ श्लो० ११ अ० । महापातकादिप्रायश्चित्त=ब्रह्महा ७३-१३१ श्लो० ११अ०। नानाविधहिंसाप्रायश्चित्त=मार्जारं १३२-१४६श्लो०११अ० अभक्ष्यभक्षणप्रायश्चित्त=अज्ञानाद् १४७-१६२श्लो०११अ० नानाविधस्तेयप्रायश्चित्त=धान्यान्नं १६३-१७०श्लो०११अ० अगम्यागमनप्रायश्चित्त=गुरु १७१-१७६श्लो० ११ अ० । १७६-१८० श्लो० ११ अ० । संसर्गप्रायश्चित्त=संवत्सरेण १८१-१८६ श्लो० ११अ० । ग्राह्याग्राह्यव्यवस्था=एन १९०-१९१ श्लो० ११ अ० । नानाविधप्रायश्चित्त=येषां १९२-२०६ श्लो० ११ अ० । प्रायश्चित्तकल्पना=अनुक्त २१० श्लो० ११ अ० । देवब्राह्मणस्वहरणप्रायश्चित्त=देवस्वं २६-२७श्लो०११अ०। गुप्तप्रायश्चित्त=अतः २४८-२६६ श्लो० ११ अ० ।
१३८ मनुस्मृति । प्राजापत्यादिव्रत=यै २११-२२७ श्लो० ११ अ० । पश्चात्ताप और तप=ख्यापनेना २२८-२४७ श्लो० ११ अ०। ( प्रजापति का दृष्टान्त ) पापचिह्न=इह ४८-५३ श्लो० ११ अ० । १-६ श्लो० १२ अ० । ५२-८१ श्लो० १२ अ० । वानप्रस्थ=एवं १-३२ श्लो० ६ अ० । संन्यास=चतुर्थ ३३-८६ श्लो० ६ अ० । ६४-६७ श्लो० ६ अ० । ८८-१०० श्लो० २ अ० । १०-५१ श्लो० १२ अ० । ८२-६४ श्लो० १२ अ० । ६७-१०४ श्लो० १२ अ० । ११६-१२६ श्लो० १२ अ० । मनुस्मृति के श्लोकों की संख्या— १=११६ २=२४६ ३=२८६ ४=२६० ५=१६६ ६= ९७ ७=२२६ ८=४२० ९=३३६ १०=१३१ ११=२६६ १२=१२६ पूर्णसंख्या=२६८५