भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 649 में से

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पृष्ठ 146

६ मनुस्मृति ।

नामक सूक्ष्म देवगण और यज्ञों को रचा। अग्नि, वायु और सूर्य इन तीनों से क्रम से यज्ञकर्म संपादन के लिये, ऋक्, यजु, साम इस त्रयी विद्या को उत्पन्न किया *। काल और काल का विभाग वर्ष, मास, पक्ष, तिथि, प्रहर, घटिका, पल, विपल आदि नक्षत्र, ग्रह, नदी, समुद्र, पर्वत और ऊंची, नीची भूमि की सृष्टि हुई ॥ २२–२४ ॥ तपो वाचं रतिं चैव कामं च क्रोधमेव च । सृष्टिं ससर्ज चैवेमां स्रष्टुमिच्छन्निमाः प्रजाः ॥ २५ ॥ कर्मणां च विवेकर्थं धर्माधर्मौ व्यवेचयत् । द्वन्द्वैरयोजयच्चेमाः सुखदुःखादिभिः प्रजाः ॥ २६ ॥ अण्व्यो मात्राविनाशिन्यो दशार्द्धानां तु याः स्मृताः । ताभिः सार्द्धमिदं सर्वं सम्भवत्यनुपूर्वशः ॥ २७ ॥ यस्तु कर्मणि यस्मिन् स न्ययुङ्क्त प्रथमं प्रभुः । स तदेव स्वयं भेजे सृज्यमानः पुनः पुनः ॥ २८ ॥

  • अग्नि, वायु और रवि से वेदत्रयी की उत्पत्ति, छान्दोग्य-उपनिषद् में इसी प्रकार है । जैसा—‘प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् । तेषां तप्यमानानां रसान् प्रावृृहत् । अग्निं पृथिव्या, वायुमन्तरिक्षात्, आदित्यं दिवः । स एतास्तिस्रो देवता अभ्यतपत् । तासां तप्यमानानां रसान् प्रावृृहत् । अग्नेर्ऋचो, वायोर्यजूंषि, सांम आदित्यात् । स एतां त्रयीं विद्यां अभ्यतपत् । तस्या तप्यमानाया रसान् प्रावृृहत् । भूरिति ऋग्भ्यो, भुवरिति यजुर्भ्यः, स्वरिति सामभ्यः ।’ तैत्तिरीय ब्राह्मण ( २ । ३ । १० ) में, ‘प्रजापतिः सोमं राजानमसृजत । तं त्रयो वेदा अन्वसृज्यन्त ।’ 'प्राजापत्यो वेदः ।' इत्यादि लेखों से और शतपथ-ब्राह्मण की श्रुतियों से, वेद की उत्पत्ति प्रजापति से सिद्ध होती है । इसके सिवा कई प्रकार के लेख मिलते हैं । परन्तु मूलभाव में भेद नहीं है । अग्नि, वायु और रवि से वेदोत्पत्ति होने से ही, ऋग्वेद का पहला मंत्र अग्निस्तुति है । यजु का वायु और साम का सूर्यस्तुति विषय का है ।