भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 649 में से

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पहला अध्याय । ७ हिंस्राहिंस्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते । यद्यस्य सोऽदधात्सर्गे तत्तस्य स्वयमाविशत् ॥ २६ ॥ सृष्टि की इच्छा करके ब्रह्मा ने तप, वाणी, रति, काम और क्रोध को उत्पन्न किया । भले और बुरे कर्मों के विचार के लिये धर्म और अधर्म को बनाया । सुख, दुःख, काम, क्रोध आदि द्वन्द्वधर्मों के अधीन संसार के प्राणियों को किया । पञ्चमहाभूतों की सूक्ष्ममात्रा-पञ्चतन्मात्राओं के साथ यह सारी सृष्टि क्रम से पैदा हुई है । सृष्टि के आदि में उस प्रभु ने, जिस स्वाभाविक कर्म में, जिसकी योजना की उसका जब जब जन्म हुआ उसी कर्म को उसने स्वयं किया। हिंस्रकर्म-अहिंस्रकर्म, मृदु-दया, क्रूर-कठोरता, धर्म-ब्रह्मचर्य, गुरुसेवा, अधर्म-झूठ बोलना आदि जो पूर्वकल्प में जिसका था वही सृष्टि के समय उसमें प्रविष्ट होगया ॥ २५-२६ ॥ यथर्तुलिङ्गान्यृतवः स्वयमेवर्तुपर्यये । स्वानि स्वान्यभिपद्यन्ते तथा कर्माणि देहिनः ॥ ३० ॥ लोकानां तु विवृद्ध्यर्थं मुखबाहूरुपादतः । ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं च निरवर्त्तयत् ॥ ३१ ॥ द्विधाकृत्वात्मनो देहमर्धेन पुरुषोभवत् । अर्धेन नारी तस्यां स विराजमसृजत्प्रभुः ॥ ३२ ॥ तपस्तप्त्वासृजद्यं तु स स्वयं पुरुषो विराट् । तं मां वित्तस्य सर्वस्य स्रष्टारं द्विजसत्तमाः ॥ ३३ ॥ अहं प्रजाः सिसृक्षुस्तु तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम् । पतीन्प्रजानामसृजं महर्षीनादितो दश ॥ ३४ ॥ मरीचिमत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् । प्रचेतसं वशिष्ठं च भृगुं नारदमेव च ॥ ३५ ॥

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