मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२ मनुस्मृति। तमोऽयं तु समाश्रित्य चिरं तिष्ठति सेन्द्रियः । न च स्वं कुरुते कर्म तदोत्क्रामति मूर्त्तितः ॥ ५५ ॥ यदाणुमात्रिको भूत्वा बीजं स्थास्नु चरिष्णु च । समाविशति संसृष्टस्तदा मूर्त्तिं विमुञ्चति ॥ ५६ ॥ एवं स जाग्रत्स्वप्नाभ्यामिदं सर्वं चराचरम् । संजीवयति चाजस्रं प्रमापयति चाव्ययः ॥ ५७ ॥ उस दशा में यह जीव इन्द्रियों के साथ बहुतकाल तक तम (सु- षुप्ति) को आश्रय करके रहता है। और अपना कर्म नहीं करता, किंतु पूर्व देहसे जुदा रहा करताहै। फिर अणुमात्रिक-शरीर बनने की आठ सामग्री हैं-जीव, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, वासना, कर्म, वायु, अविद्या-इन को शास्त्र में 'पुर्यष्टक' कहते हैं * यों पहले अणु- मात्रिक अचर और चर के हेतुभूत बीजमें प्रविष्ट होकर पुर्यष्टक में मिलकर शरीर को धारण करता है। इसप्रकार अविनाशी परमात्मा जागरण और शयन से, इस चराचर जगत् को उत्पन्न और नष्ट किया करता है ॥ ५५-५७ ॥ इदं शास्त्रं तु कृत्वासौ मामेव स्वयमादितः । विधिवद्ग्राहयामास मरीच्यादींस्त्वहं मुनीन् ॥५८॥ एतद्वोऽयं भृगुः शास्त्रं श्रावयिष्यत्यशेषतः । एतद्धि मत्तोऽधिजगे सर्वमेषोऽखिलं मुनिः ॥ ५६ ॥ ततस्तथा स तेनोक्तो महर्षिर्मनुना भृगुः । तानब्रवीदृषीन्सर्वान् प्रीतात्मा श्रूयतामिति ॥ ६० ॥
- सनन्दन ने कहा है— 'भूतेन्द्रियमनोबुद्धिवासनाकर्मवायवः । अविद्या चाष्टकं प्रोक्तं पुर्यष्टमृषिसत्तमैः ॥' गरुडपुराण में लिखा है— 'पुर्यष्टकेन लिङ्गेन प्राणाद्येन स युज्यते । तेन बद्धस्य वै बन्धो मोक्षो मुक्तस्य तेन तु ॥'