मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 153, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय । १३ मनुजी कहते हैं-प्रजापति ने सृष्टिके पूर्व इस धर्मशास्त्र को बना कर मेरे को उपदेश दिया । फिर मैंने मरीचि आदि को बताया । यह समग्र शास्त्र भृगु आप लोगों को सुनावेंगे, जो कि मेरे से सं- पूर्ण पढ़ा है । उसके बाद मनुकी आज्ञा पाकर महर्षि भृगु ने सब ऋषियों को कहा कि सुनो ॥ ५८-६० ॥ स्वायम्भुवस्यास्य मनोः षड्वंश्या मनवोऽपरे । सृष्टवन्तः प्रजाःस्वाः स्वा महात्मानो महौजसः॥ ६१ ॥ स्वारोचिषश्चौत्तमश्च तामसो रैवतस्तथा । चाक्षुषश्च महातेजा विवस्वत्सुत एव च ॥ ६२ ॥ स्वायम्भुव मनु के वंश में, छः मनु और हैं। उन्होंने अपने अपने काल में प्रजाकी सृष्टि, पालन आदि किया है। उनका नाम-स्वारो- चिष, औत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष और वैवस्वत है ॥ ६१-६२ ॥ स्वायम्भुवाद्याः सत्तैते मनवो भूरितेजसः । स्वे स्वेन्तरे सर्वमिदमुत्पाद्यायुश्चराचरम् ॥ ६३ ॥ निमेषा दश चाष्टौ च काष्ठात्रिंशत्तु ताः कलाः । त्रिंशत्कला मुहूर्तः स्यादहोरात्रं तु तावतः ॥ ६४ ॥ अहोरात्रे विभजते सूर्यो मानुषदैविके । रात्रिः स्वप्नाय भूतानां चेष्टायै कर्मणामहः ॥ ६५ ॥ पित्र्ये रात्र्यहनी मासः प्रविभागस्तु पक्षयोः । कर्मचेष्टास्वहः कृष्णः शुक्लः स्वप्नाय शर्वरी ॥ ६६ ॥ अब मन्वन्तर आदि काल का मान कहते हैं-आँख की पलक गिरने का समय निमेष कहलाता है, १८ निमेष की एक काष्ठा ना- मक काल होता है। ३० काष्ठा की कला, ३० कलाका मुहूर्त, ३० मुहूर्त का अहोरात्र होता है । मानुष और दैव अहोरात्र-दिन, रात का विभाग सूर्य करता है । उसमें प्राणियों के सोने के लिए रात और कर्म करने के लिए दिन होता है । मनुष्यों के एक मास