भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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पहला अध्याय। १५ कलि १२००=४३२०००; मान होते हैं । यह जो पहले चारों युगों की बारह हजार १२००० दैववर्ष संख्या कही है, यह एक दैवयुग का मान है । ऐसे हज़ार दैवयुगों का ब्रह्मा का १ दिन और उतनी ही रात होती है । अर्थात् दो हजार दैववर्षों का ब्रह्मा का अहो- रात्र होता है । १२००० दैववर्ष का १ युग, इसको १००० गुणा करने से १,२०००००० दैववर्षों का ब्राह्मदिन और इतनी ही रात्रि हुई । इसे ३६० गुणने से ४३२००००००० मानुषवर्षों का ब्राह्मदिन और उतनी ही रात्रि हुई * ॥ ६७-७२ ॥ तद्वै युगसहस्रान्तं ब्राह्मं पुण्यमहर्विदुः । रात्रिं च तावतीमेव तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥ ७३ ॥ तस्य सोहर्निशस्यान्ते प्रसुप्तः प्रतिबुध्यते । प्रतिबुद्धश्च सृजति मनः सदसदात्मकम् ॥ ७४ ॥ मनः सृष्टिं विकुरुते चोद्यमानं सिसृक्षया । आकाशाज्जायते तस्मात्तस्य शब्दं गुणं विदुः ॥ ७५ ॥ आकाशात्तु विकुर्वाणात्सर्वगन्धवहः शुचिः । बलवाञ्जायते वायुः स वै स्पर्शगुणो मतः ॥ ७६ ॥ वायोरपि विकुर्वाणाद्विरोचिष्णु तमोनुदम् । ज्योतिरुत्पद्यते भास्वत्तद्रूपगुणमुच्यते ॥ ७७ ॥ ज्योतिषश्च विकुर्वाणादापोरसगुणाः स्मृताः । अद्भ्योगन्धगुणा भूमिरित्येषा सृष्टिरादितः ॥ ७८ ॥ एक हज़ार युग का ब्रह्मा का पुण्यदिन और उतनी ही रात्रि है । उस रात्रि के अन्त में ब्रह्मा सोकर जागता है और अपने मन को सृष्टि में प्रेरित करता है । परमात्मा की इच्छा से प्रेरित मन, सृष्टि को करता है । मनस्तत्त्व से आकाश पैदा होता है जिस का

  • ये सब युगों के मान सूर्यसिद्धान्त में भी इसी प्रकार हैं । इसी आधार से ग्रहभगण आदि के मान सिद्धान्तों में लिखे गये हैं । जो आधुनिक मत से प्रायः मिलते हैं ।