भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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१६ मनुस्मृति । गुण शब्द है। आकाश के विकार से, गन्ध को धारण करनेवाला, पवित्र वायु उत्पन्न हुआ है, उसका स्पर्शगुण है। वायु के विकार से, अन्धकार को नाश करनेवाला, प्रकाशमान अग्नि पैदा हुआ है, उसका गुण रूप है। अग्नि से जल, जिसका गुण रस है और जल से पृथिवी, जिसका गुण गन्ध है। यही आदि से सृष्टि का क्रम है * ॥ ७३-७८ ॥ यत्प्राग् द्वादशसाहस्रमुदितं दैविकं युगम् । तदेकसप्ततिगुणं मन्वन्तरमिहोच्यते ॥ ७९ ॥ मन्वन्तराण्यसंख्यानि सर्गः संहार एव च । क्रीडन्निवैतत्कुरुते परमेष्ठी पुनः पुनः ॥ ८० ॥ चतुष्पात्सकलो धर्मः सत्यं चैव कृते युगे । नाधर्मेणागमः कश्चिन्मनुष्यान् प्रतिवर्तते ॥ ८१ ॥ इतरेष्वागमाद्धर्मः पादशस्त्ववरोपितः । चौरिकानृतमायाभिर्धर्मश्चापैति पादशः ॥ ८२ ॥ अरोगाः सर्वसिद्धार्थाश्चतुर्वर्षशतायुषः । कृते त्रेतादिषु ह्येषामायुर्ह्रसति पादशः ॥ ८३ ॥ वेदोक्तमायुर्मर्त्यानामाशिषश्चैव कर्मणाम् । फलन्त्यनुयुगं लोके प्रभावश्च शरीरिणाम् ॥ ८४ ॥ अन्ये कृतयुगे धर्मास्त्रेतायां द्वापरे परे । अन्ये कलियुगे नृणां युगह्रासानुरूपतः ॥ ८५ ॥ पूर्व जो बारह हजार वर्ष का एक दैवयुग कहा है, ऐसे ७१ युगों का एक मन्वन्तरकाल होता है । मन्वन्तर असंख्य हैं, सृष्टि और संहार भी असंख्य हैं। परमात्मा यह सब बिना श्रम-खेल के

  • इसी प्रकार तैत्तिरीय श्रुतिहै-‘आकाशाद्वायुः वायोरग्निरग्नेरापोऽद्द्भ्यः पृथिवी’ इत्यादि ।