भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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४६ मनुस्मृति । मातृष्वसा मातुलानी श्वश्रूरथ पितृष्वसा । संपूज्या गुरुपत्नीवत्समास्ता गुरुभार्यया ॥ १३१ ॥ भ्रातुर्भार्योपसंग्राह्या सवर्णाऽन्वहन्वपि । विप्रोष्य तूपसंग्राह्या ज्ञातिसम्बन्धियोषितः ॥ १३२ ॥ यज्ञादि में दीक्षित ब्राह्मण उमर में छोटा हो तो भी उसका नाम न लेवे, उसको 'भोः' 'भवान्' कहकर पुकारना वा कुछ कहना चाहिए। जो दूसरे की स्त्री हो, या जिससे सम्बन्ध न हो उससे आप, सुभगे, वहन कहकर बोलना । मामा, पिता का भाई, श्वशुर, ऋत्विज और गुरु ये यदि उमर में छोटे हों, तो भी, मिलने पर उठकर अपना नाम ज़ाहिर करना चाहिए। मौसी, मामी, सास और बुआ, ये सब गुरु-स्त्री के समान पूज्य हैं। ज्येष्ठ भाई की सवर्णा स्त्री से रोज प्रणाम आदि करना चाहिए। और जाति, सम्बन्धी स्त्रियों को पितृकुल या मातृकुल में, विदेश से आने पर प्रणाम करना चाहिए ॥ १२८-१३२ ॥ पितुर्भगिन्यां मातुश्च ज्यायस्यां च स्वसर्यपि । मातृवद्वृत्तिमातिष्ठेन्माता ताभ्यो गरीयसी ॥ १३३ ॥ दशाब्दाख्यं पौरसख्यं पञ्चाब्दाख्यं कलाभृताम् । त्र्यब्दपूर्वं श्रोत्रियाणां स्वल्पेनापि स्वयोनिषु ॥ १३४ ॥ पिता की वहन, माता की वहन और बड़ी वहन माता के समान आदर योग्य हैं, पर माता इन सब से श्रेष्ठ है। एक नगर का निवासी उमर में दश वर्ष का, नाच, गान जाननेवाला उमर में पाँच वर्ष का, वेदज्ञ तीन वर्ष का और सम्बन्धी थोड़े ही दिनका, ये सब समान अवस्था के माने जाते हैं ॥ १३३-१३४ ॥ ब्राह्मणं दशवर्षं तु शतवर्षं तु भूमिपम् । पितापुत्रौ विजानीयाद्ब्राह्मणस्तु तयोः पिता ॥१३५॥