मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 187, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय । ४७ वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या भवति पञ्चमी । एतानि मान्यस्थानानि गरीयो यद्यदुत्तरम् ॥ १३६ ॥ पञ्चानां त्रिषु वर्णेषु भूयांसि गुणवन्ति च । यत्र स्युः सोऽत्र मानार्हः शूद्रोऽपि दशमींगतः ॥१३७॥ दश वर्ष के ब्राह्मण को, सौ वर्ष का भी क्षत्रिय पिता माने और अपने को पुत्र माने। धन, कुटुम्ब, आयु, कर्म और विद्या ये पाँच मानके स्थान हैं। इनमें, पहले से दूसरा क्रम से अधिक मान्य होता है। तीनों वर्णों में जो इन पाँच बातों में बढ़ा हो वही जगत् में माननीय है और दशवीं अवस्था में ( ६० वर्ष में ) शूद्र भी मान योग्य होता है ॥ १३५-१३७ ॥ चक्रिणो दशमीस्थस्य रोगिणो भारिणः स्त्रियाः । स्नातकस्य च राज्ञश्च पन्था देयो वरस्य च ॥ १३८॥ तेषां तु समवेतानां मान्यौ स्नातकपार्थिवौ । राजस्नातकयोश्चैव स्नातको नृपमानभाक् ॥ १३६॥ उपनीय तु यः शिष्यं वेदमध्यापयेद्द्विजः । सकल्पं सरहस्यं च तमाचार्य प्रचक्षते ॥ १४० ॥ एकदेशं तु वेदस्य वेदाङ्गान्यपि वा पुनः । योऽध्यापयति वृत्त्यर्थमुपाध्यायः स उच्यते ॥ १४१ ॥ गाड़ी में बैठा, नब्बे वर्ष से अधिक उमर का वृद्ध, रोगी, शिर पर बोझा लिए, स्त्री, वेदपाठी, ब्रह्मचारी, राजा और विवाह में वर, इनको देखकर मार्ग छोड़ देना चाहिए। ये सब जहां इकट्ठे हों वहां स्नातक ब्राह्मण, जिसका वेदपाठ होगया है, और राजा अधिक मान्य होता है। इन दोनों में भी राजा स्नातक का मान करे। जो अपने शिष्य का उपनयन करके उसे साङ्गवेद पढ़ाता है वह 'आचार्य' कहलाता है। जो ब्राह्मण वेद या उसके अङ्गों को जीविका के लिए पढ़ाता है, वह 'उपाध्याय' कहलाता है॥१३८-१४१॥