मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 280, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें१४० मनुस्मृति । पौर्विकीं संस्मरन् जातिं ब्रह्मैवाभ्यसते पुनः । ब्रह्माभ्यासेन चाजस्रमनन्तंसुखमश्नुते ॥ १४६ ॥ सावित्रान् शान्तिहोमांश्च कुर्यात् पर्वसु नित्यशः । पितॄंश्चाष्टकास्वर्चयेन्नित्यमन्वष्टकासु च ॥ १५० ॥ दूरादावसथान्मूत्रं दूरात् पादावसेचनम् । उच्छिष्टान्ननिषेकं च दूरादेव समाचरेत् ॥ १५१ ॥ मन्त्रप्रसाधनं स्नानं दन्तधावनमञ्जनम् । पूर्वाह्न एव कुर्वीत देवतानाञ्च पूजनम् ॥ १५२ ॥ दैवतान्यभिगच्छेत्तु धार्मिकांश्च द्विजोत्तमान् । ईश्वरं चैव रक्षार्थं गुरूनेव च पर्वसु ॥ १५३ ॥ पूर्व जन्म की जाति को स्मरण करता हुआ वेदका स्वाध्याय किया करता है और वेदाभ्यास से अक्षय सुख पाता है । द्विज को पर्व दिनों में और नित्यभी शान्ति होम आदि करना चाहिए । अष्टका और अन्वष्टका* में श्राद्ध द्वारा पितरों का पूजन करना चाहिए । हवन स्थान से दूर पर मल मूत्र का त्याग, पैर धोना, जूठा अन्न और वीर्य का त्याग, करना चाहिए । शौच, दातन, स्नान, अंजन, लेपन और देवता का पूजन यह सब प्रातः काल में ही करना चाहिए । पर्व दिनों में देवमूर्ति, श्रेष्ठ ब्राह्मण, राजा, पिता और गुरुजनों का दर्शन अवश्य करना चाहिए ॥ १४६-१५३ ॥ अभिवादयेद् वृद्धांश्च दद्याच्चैवासनं स्वकम् । कृताञ्जलिरुपासीत गच्छतः पृष्ठतोऽन्वियात् ॥१५४॥ श्रुतिस्मृत्युदितं सम्यङ् निबद्धं स्वेषु कर्मसु । धर्ममूलं निषेवेत सदाचारमतन्द्रितः ॥ १५५ ॥
- हेमन्त और शिशिर ऋतु में, कृष्णपक्ष की सप्तमी और नवमी तिथि को 'अन्वष्टका' कहते हैं ।