भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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चौथा अध्याय । १३६ अनातुरः स्वानि खानि न स्पृशेदनिमित्ततः । रोमाणि च रहस्यानि सर्वाण्येव विवर्जयेत् ॥ १४४ ॥ मङ्गलाचारयुक्तः स्यात् प्रयतात्मा जितेन्द्रियः । जपेच्च जुहुयाच्चैव नित्यमग्निमतन्द्रितः ॥ १४५ ॥ मङ्गलाचारयुक्तानां नित्यं च प्रयतात्मनाम् । जपतां जुह्वतां चैव विनिपातो न विद्यते ॥ १४६ ॥ ब्राह्मण को जूठे मुख से या, अपवित्र दशा में गौ, ब्राह्मण और अग्नि को न छूना चाहिए। और शरीर निरोग होने पर, अपवित्र दशामें, आकाश में सूर्य, चन्द्र आदि न देखना चाहिए। अपवित्र दशा में गौ, ब्राह्मण और अग्नि का स्पर्श हो जाने पर, जल से नेत्र आदि इन्द्रियों का स्पर्श करे और गीली हथेली से नाभि को छुवे । तंदुरुस्त आदमी को बिना मतलब, अपनी इन्द्रियों को न छूना चाहिए। और पोशीदा जगह के रोम भी न छुवे। सदा मङ्गल वस्तुओं का सेवन, मनको अपने वश में रखना, गायत्री आदि का जप और हवन सदा करना चाहिए। मङ्गलाचार करनेवाला, जप-हवन करनेवाला, जितेन्द्रिय मनुष्य इस लोक और परलोक में सुख पाता है ॥ १४२-१४६ ॥ वेदमेवाभ्यसेन्नित्यं यथाकालमतन्द्रितः । तं ह्यस्याहुः परं धर्ममुपधर्मोऽन्य उच्यते ॥ १४७ ॥ वेदाभ्यासेन सततं शौचेन तपसैव च । अद्रोहेण च भूतानां जातिं स्मरति पौर्विकीम् ॥ १४८ ॥ द्विज को सावधान होकर रोज वेदपाठ करना चाहिए। यह मुख्य धर्म है। और सब गौण धर्म हैं। वेदाभ्यास, पवित्रता, जप और प्राणियों से प्रीति करने से, मनुष्य को अपने पूर्वजन्म का स्मरण होता है ॥ १४७-१४८ ॥