मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३८ मनुस्मृति । सब बातों के होते भी पुरुष को अपना अपमान—अर्थात् मैं अ- भागी हूं, किसी लायक नहीं हूं इत्यादि कहकर अपमान न करना चाहिए। वरन सदा उद्योग करते रहना और लक्ष्मी को दुर्लभ न मानना चाहिये। सत्य वचन बोलना और प्रिय मीठा बोलना चाहिए। जो प्रिय न लगे ऐसा सत्य भी न कहना चाहिए और प्रिय लगनेवाली झूठी बात भी न कहनी। यह सनातन धर्म है ॥ १३५-१३८ ॥ भद्रं भद्रमिति ब्रूयाद् भद्रमित्येव वा वदेत् । शुष्कवैरं विवादं च न कुर्यात् केनचित् सह ॥ १३६ ॥ नातिकल्यं नातिसायं नातिमध्यन्दिने स्थिते । नाज्ञातेन समं गच्छेत् नैको न वृषलैः सह ॥ १४० ॥ हीनाङ्गानतिरिक्ताङ्गान् विद्याहीनान् वयोऽधिकान् । रूपद्रव्यविहीनांश्च जातिहीनांश्च नाक्षिपेत् ॥ १४१ ॥ जहां अभद्र हो वहां भी भद्रशब्द से ही बोलना। सब से मिल कर 'अच्छे हो' 'कुशल है, इत्यादि बोलना चाहिए। व्यर्थ झगड़ा वखेड़ा किसी से न करना चाहिए। न बहुत सबेरे और न बहुत शाम को और न दोपहर कोही अकेला कहीं जाना। और अनजान के साथ, अकेला और शूद्रों के साथ कहीं न जाना चाहिए। काना, लुला, छंगुला वगैरह विद्याहीन, अपने से अधिक उमरवाला, कुरूप, निर्धन और हीनजातिवाले को कभी कुवाच्य काना, मूर्ख, कर्भाना आदि न कहना चाहिए ॥ १३६-१४१ ॥ न स्पृशेत्पाणिनोच्छिष्टो विप्रो गोब्राह्मणानलान् । नचापि पश्येदशुचिः सुस्थोज्योतिर्गणान् दिवि ॥ १४२ ॥ स्पृष्ट्वैतानशुचिर्नित्यमद्भिः प्राणानुपस्पृशेत् । गात्राणि चैव सर्वाणि नाभिं पाणितलेन तु ॥ १४३ ॥