भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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चौथा अध्याय । १३७ उद्वर्त्तनमपस्नानं विण्मूत्रे रक्तमेव च । श्लेष्मनिष्ठ्यूतवान्तानि नाधितिष्ठेत्तु कामतः ॥ १३२ ॥ वैरिणं नोपसेवेत साहाय्यं चैव वैरिणः । अधार्मिकं तस्करं च परस्यैव च योषितम् ॥ १३३ ॥ नहीदृशमनायुष्यं लोके किञ्चन विद्यते । यादृशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम् ॥ १३४ ॥ उबटन, स्नान से बचा जल, विष्ठा, मूंज्र, रुधिर, खखार, थूक और वमन इनको जानकर छूना न चाहिए । शत्रु, शत्रु का मददगार, अधर्मी, चोर और परस्त्री इनका साथ न करना। इस संसार में मनुष्य के आयु का नाश करनेवाला जैसा परस्त्री सहवास है वैसा दूसरा कोई पदार्थ नहीं है ॥ १३२-१३४ ॥ क्षत्रियञ्चैव सर्प च ब्राह्मणं च बहुश्रुतम् । नावमन्येत वै भूष्णुः कृशानपि कदाचन ॥ १३५ ॥ एतत्त्रयं हि पुरुषं निर्दहेदवमानितम् । तस्मादेतत्त्रयं नित्यं नावमन्येत बुद्धिमान् ॥ १३६ ॥ नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः । आमृत्योःश्रियमन्विच्छेन्नैनां मन्येत दुर्लभाम् ॥१३७॥ सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् । प्रियञ्च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः ॥ १३८ ॥ जो पुरुष अपना भला चाहे उसको क्षत्रिय, सांप और वेदज्ञ ब्राह्मण यदि दुर्बल हों तो भी इनका अपमान न करना चाहिए । ये तीनों अपमानित होकर पुरुष का नाश कर देते हैं, इस लिये बुद्धिमान् को इनका अपमान कभी न करना चाहिए। पूर्वजों की सम्पत्ति नहीं है, या कोई उपार्जन की रीति सफल नहीं हुई- इन