भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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१३६ मनुस्मृति ।

अन्तरागमने विद्यादनध्यायमहर्निशम् ॥ १२६ ॥ द्वावेव वर्जयेन्नित्यमनध्यायौ प्रयत्नतः । स्वाध्यायभूमिं चाशुद्धामात्मानं चाशुचिं द्विजः ॥१२७॥ पशु, गौ आदि, मेंडक, कुत्ता, सांप, नौला और चूहा ये पढ़ते समय गुरु-शिष्यके बीच में होकर निकल जायें तो एक दिन-रात का अनध्याय करना । पढ़नेका स्थान या आप अपवित्र हो, इन दो अनध्यायों को ज़रूर मानना चाहिए ॥ १२६-१२७ ॥ अमावास्यामष्टमीं च पौर्णमासीं चतुर्दशीम् । ब्रह्मचारी भवेन्नित्यमप्यृतौ स्नातको द्विजः ॥ १२८ ॥ न स्नानमाचरेद्भुक्त्वा नातुरो न महानिशि । न वासोभिः सहाजस्रं नाविज्ञाते जलाशये ॥ १२६ ॥ देवतानां गुरो राज्ञः स्नातकाचार्ययोस्तथा । नाक्रामेत् कामतश्छायां बभ्रु णो दीक्षितस्य च ॥१३०॥ मध्यन्दिनेऽर्धरात्रे च श्राद्धं भुक्त्वा च सामिषम् । सन्ध्ययोरुभयोश्चैव न सेवेत चतुष्पथम् ॥ १३१ ॥ विधि और निषेध । स्नातक द्विज अमावास्या, अष्टमी, पूर्णिमा और चतुर्दशी के दिन ऋतु हो तो भी स्त्री-सहवास न करे । भोजन करने के बाद रोगी शरीर में और आधी रात को स्नान न करना । बहुत कपड़े पहन कर और विना जाने तालाब आदि में स्नान न करना । देव- मूर्त्ति, गुरु, राजा, स्नातक, आचार्य, कपिला गौ और यज्ञ में दी- क्षित पुरुष की छाया को कभी न उलांघना । दोपहर, आधीरात, श्राद्ध में मांस आदिक भोजन करके, प्रातःसंध्या और सायंसंध्या के समय, चौराहा में अधिक समय न रहना चाहिए ॥१२८-१३१॥