भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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चौथा अध्याय । १३५ न विवादे न कलहे न सेनायां न सङ्गरे । न भुक्तमात्रे नाजीर्णे न वमित्वा न सूतके ॥ १२१ ॥ अतिथिंचाननुज्ञाप्य मारुते वाति वा भृशम् । रुधिरे च स्रुते गात्राच्छस्त्रेण च परिक्षते ॥ १२२ ॥ सामध्वनावृग्यजुषी नाधीयीत कदाचन । वेदस्याधीत्य वाप्यन्तमारण्यकमधीत्य च ॥ १२३ ॥ ऋग्वेदो देवदैवत्यो यजुर्वेदस्तु मानुषः । सामवेदः स्मृतः पित्र्यस्तस्मात्तस्याशुचिर्ध्वनिः ॥१२४॥ एतद्विदन्तो विद्वांसस्त्रयीनिष्कर्षमन्वहम् । क्रमशः पूर्वमभ्यस्य पश्चाद्वेदमधीयतें ॥ १२५ ॥ जहां किसी बातकी बहस होती हो, झगड़ा हो, सेनामें, लड़ाई में, भोजन करते, अजीर्ण होने पर, वमन करके और सूतक में वेद न पढ़ना चाहिए । अतिथि की आज्ञा विना लिए, ज़ोर से हवा च- लती हो, शरीर से खून गिरता हो और शस्त्र से घायल हो जाने पर वेदाध्ययन न करना चाहिए । सामवेद का पाठ होता हो, तब ऋग्वेद और यजुर्वेद का पाठ न करना । वेदको समाप्त करके और आरण्यक का पाठ करके, एक दिन रात वेदान्तर को न पढ़ना । ऋग्वेद का देव देवता है अर्थात् उसमें देव स्तुतियां हैं । यजुर्वेद मानुष है, अर्थात् उसमें मनुष्यों का कर्मकाण्ड कहा है । सामवेद पितृदैवत है अर्थात् पितरों का माहात्म्य उसका मुख्य विषय है। इस लिए सामवेद की ध्वनि ऋक् और यजु की अपेक्षा अशुचि, अपवित्रसी है। इन सब बातों को जाननेवाले विद्वानों को नित्य तीनों वेद के सारभूत ॐकार, तीन व्याहृति 'भूः भुवः स्वः' और गायत्री का क्रम से उच्चारण करके वेदाध्ययन करना चाहिए ॥ १२१-१२५ ॥ पशुमण्डूकमार्जारश्वसर्पनकुलाखुभिः ।