मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३४ मनुस्मृति। प्राणि वा यदि वाऽप्राणि यत्किञ्चिच्छाद्धिकं भवेत् । तदालभ्याप्यनध्यायःप्राण्यास्योहिद्विजःस्मृतः ॥११७॥ अमावास्या को वेदाध्ययन करने से गुरु का और चतुर्दशी को शिष्य का नाश होता है। अष्टमी को पढ़ने से वेद भूल जाता है। इस लिए इन सब अनध्यायों में वेदपाठ मना है। धूल की वर्षा, दिशाओं का दाह, शृगाल, कुत्ता, गधा और ऊंटों के रोने पर और ये सब पांत बांधकर बैठे हों, उस समय अनध्याय करना। श्म- शान के पास, गांव के हद्द पर, गौओं के चरने के स्थान में, मैथुन- समय के वस्त्र पहनकर और श्राद्ध में भोजन करके वेदपाठ न क- रना चाहिए। कोई पदार्थ जीवधारी हो या जड़ हो, कुछभी श्राद्ध में वस्तु देकर अनध्याय करना चाहिए। क्योंकि शास्त्र में ब्राह्मण का हाथ ही मुखरूप है, इस लिए लेना ही भोजन माना जाता है ॥ ११४-११७ ॥ चौरैरुपप्लुते ग्रामे संभ्रमे चाग्निकारिते । आकालिकमनध्यायं विद्यात्सर्वाद्भुतेषु च ॥ ११८ ॥ उपाकम्मणि चोत्सर्गे त्रिरात्रं क्षेपणं स्मृतम् । अष्टकासु त्वहोरात्रमृत्वन्तासु च रात्रिषु ॥ ११९ ॥ नाधीयीताश्वमारूढो न वृक्षं न च हस्तिनम् । न नावं न खरं नोष्ट्रं नेरिणस्थो न यानगः ॥ १२० ॥ चोरों के उपद्रववाले गांव में आग लगजाने पर और आकाश किंवा पृथिवी में आश्चर्य घटना होने पर, उस काल तक अनध्याय मानना। उपाकर्म और वेद के उत्सर्ग में तीन रात अनध्याय मानना। अष्टका * और ऋतु के अन्त में एक दिन रात अनध्याय करना। घोड़े पर, वृक्ष पर, हाथी पर, नाव पर, गधे पर, ऊंट पर, ऊसर भूमि में और सवारी में बैठकर वेद न पढ़ना चाहिए ॥ ११८-१२० ॥
- मार्गशीर्ष की पूर्णा के बाद कृष्णपक्ष की चार अष्टमी को 'अष्टका श्राद्ध' होता है।