भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 312, कुल 649 में से

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१७२ मनुस्मृति । उनके मरने से एक दिन में और चूड़ा कर्म होजाने पर तीन दिन में, सपिण्ड पुरुष की शुद्धि होती है। दो वर्ष से कम उमर का बालक मर जाय तो उसको पुष्पमाला, चंदन आदि से भूषित करके, नगर के बाहर पवित्र भूमि में गाड़ देवे और उसका अस्थि संचयन न करे ॥ ६५-६८ ॥ नास्य कार्योऽग्निसंस्कारो न च कार्योदकक्रिया । अरण्ये काष्ठवत्त्यक्त्वा क्षपेयुस्त्र्यहमेव च ॥ ६९ ॥ नात्रिवर्षस्य कर्तव्या बान्धवैरुदकक्रिया । जातदन्तस्य वा कुर्युर्नाम्नि वापि कृते सति ॥ ७० ॥ सब्रह्मचारिण्येकाहमतीते क्षपणं स्मृतम् । जन्मन्येकोदकानां तु त्रिरात्राच्छुद्धिरिष्यते ॥ ७१ ॥ और इस बालक का अग्नि संस्कार, जलदान आदि कुछ न करना। सिर्फ़ जंगल में, काठ की भांति गढ़े में, छोड़ कर तीन दिन सूतक मानना चाहिए। तीन वर्ष से कम अवस्था का बालक होने पर, सपिण्डों को जलदान न करना चाहिए। अथवा, दांत निकले हों, नामकरण होगया हो तो जलदान कर भी सकते हैं। सहाध्यायी के मरने पर एक दिन आशौच होता है और समानोदक के यहां सन्तति होने पर तीन दिन में शुद्धि होती है ॥ ६६-७१ ॥ स्त्रीणामसंस्कृतानां तु त्र्यहाच्छुध्यन्ति बान्धवाः । यथोक्तेनैव कल्पेन शुध्यन्ति तु सनाभयः ॥ ७२ ॥ अक्षांरलवणाश्राः स्युर्निमज्जेयुश्च ते त्र्यहम् । मांसाशनं च नाश्नीयुः शयीरंश्च पृथक् क्षितौ ॥ ७३ ॥ संनिधावेष वैकल्पः शावाशौचस्य कीर्तितः । असंनिधावयं ज्ञेयो विधिः सम्बन्धिवान्धवैः ॥ ७४ ॥