भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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पृष्ठ 313

[Page Header: पांचवां अध्याय। १७३]

विगतं तु विदेशस्थं शृणुयाद्यो ह्यनिर्देशम् । यच्छेषं दशरात्रस्य तावदेवाशुचिर्भवेत् ॥ ७५ ॥

जिस कन्या का विवाह न भया हो, सगाई भई हो, उसके निधन में ससुराल वाले और पितृकुल के तीन रात में शुद्ध होते हैं। मृत्यु सूतक वाले को क्षार, अलोना भोजन करना चाहिए। तीन दिन तक नदी में स्नान करे और मांस भक्षण न करे, भूमि में अलग सोवे। जो सपिण्ड और समानोदक पुरुष, मरणकाल में समीप हों उनके लिए यह आशौचविधि कही गई है। और जो पास न हों उनके लिए आगे कही विधि जाननी चाहिए। विदेश में मरने का हाल दश दिन के भीतर जाने तो जितने दिन बाकी हों उतने ही दिन सूतक होता है ॥ ७२-७५ ॥

अतिक्रान्ते दशाहे तु त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् । संवत्सरे व्यतीते तु स्पृष्ट्रै वापो विशुद्ध्यति ॥ ७६ ॥ निर्दशं ज्ञातिमरणं श्रुत्वा पुत्रस्य जन्म च । सवासा जलमाप्लुत्य शुद्धो भवति मानवः ॥ ७७ ॥ बाले देशान्तरस्थे च पृथक् पिण्डे च संस्थिते । सवासा जलमाप्लुत्य सद्य एव विशुद्ध्यति ॥ ७८ ॥ अन्तर्दशाहे स्यातां चेत्पुनर्मरणजन्मनी । तावत्स्यादशुचिर्विप्रो यावत्तत्स्यादनिर्देशम् ॥ ७९ ॥ त्रिरात्रमाहुराशौचमाचार्ये संस्थिते सति । तस्य पुत्रे च पत्न्यां च दिवारात्रमिति स्थितिः॥८०॥

दश दिन बीतने पर मृत्यु सुने तो तीनदिन का आशौच होता है और एक वर्ष बीतने पर स्नानमात्र सेही शुद्धि होजाती है।