भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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पृष्ठ 441

आठवां अध्याय। ३०१ को तोड़े उसपर एकमासिक दण्ड करे और वह उस चीज़ को वहीं लाकर रखदे। बीस द्रोण का एक कुम्भ-ऐसे दश कुम्भ अन्न चुराने वाले को खूब पीटे और इससे कम हो तो ग्यारहगुना जुर्माना करे और चोरी का माल उसके मालिक को दिलावे। ऐसेही तराजू से तोलने क़ाबिल सोना, चांदी या वस्त्रादि चुराने पर यदि पदार्थ सौ १०० पल से अधिक हो तो चोर को मारडाले। और पचास पल से अधिक हो तो चोर के हाथ कटवा डाले। इससे कम हो तो माल से ग्यारहगुना जुर्माना करे। किसी कुलीन पुरुष या स्त्री के बहुमूल्य जेवर, जवाहिरात चुरानेवाले का कोई अङ्ग काट डालना चाहिए ॥ ३१६-३२३ ॥ महापशूनां हरणे शस्त्राणामौषधस्य च। कालमासाद्य कार्यं च दण्डं राजा प्रकल्पयेत् ॥ ३२४ ॥ गोषु ब्राह्मणसंस्थासु छुरिकायाश्च भेदने। पशूनां हरणे चैव सद्यः कार्योऽर्धपादिकः ॥ ३२५ ॥ सूत्रकार्पासकिण्वानां गोमयस्य गुडस्य च। दध्नः क्षीरस्य तक्रस्य पानीयस्य तृणस्य च ॥३२६॥ बड़े पशु, शस्त्र और औषध चुराने पर समय और अपराध के अनुसार राजा दण्ड करे। ब्राह्मणों की और गौओं की चोरी या छुरी से मारने पर तुरन्त आधा पैर कटवा देना चाहिए। सूत, कपास, मदिरा की गाद, गोबर, गुड़, दही, दूध, माठा, जल और तृण-घास चुराने पर मूल्य से दूना दण्ड करे ॥ ३२४-३२६॥ वेणुवैदलभाण्डानां लवणानां तथैव च। मृण्मयानां च हरणे मृदो भस्मन एव च ॥ ३२७ ॥ मत्स्यानां पक्षिणां चैव तैलस्य च घृतस्य च। मांसस्य मधुनश्चैव यच्चान्यत्पशुसम्भवम् ॥ ३२८ ॥