भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 442, कुल 649 में से

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३०२ मनुस्मृति । अन्येषां चैवमादीनां मद्यानामाोदनस्य च । पक्वान्नानां च सर्वेषां तन्मूल्याद्द्विगुणो दमः ॥३२६॥ पुष्पेषु हरिते धान्ये गुल्मवल्लीनगेषु च । अन्येष्वपरिपूतेषु दण्डः स्यात्पञ्चकृष्णलः ॥ ३३० ॥ परिपूतेषु धान्येषु शाकमूलफलेषु च । निरन्वये शतं दण्डः सान्वयेऽर्धशतं दमः ॥ ३३१ ॥ स्यात्साहसं त्वन्वयवत् प्रसभं कर्म यत्कृतम् । निरन्वयं भवेत्स्तेयं हृत्वापह्नूयते च यत् ॥ ३३२ ॥ यस्त्वेतान्युपक्लृप्तानि द्रव्याणि स्तेनयेन्नरः । तमाद्यं दण्डयेद्राजा यश्चाग्निं चोरयेद् गृहात् ॥३३३॥ येन येन यथाङ्गेन स्तेनो नृषु विचेष्टते । तत्तदेव हरेत्तस्य प्रत्यादेशाय पार्थिवः ॥ ३३४ ॥ बांस के पात्र, निमक, मट्टी के पात्र, मट्टी, राख, मछली, चि- ड़िया, तेल, घी, मांस, मधु, पशुओं के सींग आदि और ऐसेही दूसरे पदार्थ, मदिरा, भात और सब भांति के पक्वान्न चुराने पर माल के दाम से दूना दाम दण्ड करे । फूल, खेत का हरा अन्न, गुल्म, लता, वृक्ष और धान वगैरह चुराने पर, पाँच 'कृष्णल' दण्ड करे । सफ़ा अन्न, शाक, मूल और फलों का चोर यदि कुटुम्बी न हो तो सौ पण और हो तो पचास पण दण्ड करे । जो पदार्थ जबरन् स्वामी के सामने छीना हो वह साहस-लूट है और जो पदार्थ स्वामी के पीछे लिया हो और क़बूल न करे तो वह चोरी है । ऊपर कहे पदार्थों को जो चुरावै और जो घर से आग चुरावै उन पर प्रथम-साहस, राजा दण्ड करे । चोर, जिस जिस अङ्ग से मनुष्यों की चोरी या मार-काट वगैरह करे, उसका वही अङ्ग शिक्षा देने के लिए राजा कटवा देवे ॥ ३२७-३३४ ॥

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