मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[Page Header] नवां अध्याय । ३५१
[Main Text] समान बाँट लें । और उन लड़कियों की जो अविवाहित हों उनको नानी के धन में से कुछ प्रसन्नता से दे देवें ॥ १५०-१५३ ॥ अध्यग्न्यध्यावाहनिकं दत्तं च प्रीतिकर्मणि । भ्रातृमातृपितृप्राप्तं षड्विधं स्त्रीधनं स्मृतम् ॥ १९४ ॥ अन्वाधेयं च यद्दत्तं पत्या प्रीतेन चैव यत् । पत्यौ जीवति वृत्तायाः प्रजायास्तद्धनं भवेत् ॥१९५॥ ब्राह्मदैवार्षगान्धर्वप्राजापत्येषु यद्वसु । अप्रजायामतीतायां भर्तुरेव तदिष्यते ॥ १९६ ॥ यत्त्वस्याः स्याद्धनं दत्तं विवाहेष्वासुरादिषु । अप्रजायामतीतायां मातापित्रोस्तदिष्यते ॥ १९७ ॥ स्त्रीधन आदि। विवाह में अग्नि समीप में पिता आदि का दिया, ससुराल में पाया हुआ आभूषण आदि, पति का दिया, पिताका दिया, भाई का दिया और माता से पाया ये छः प्रकार के स्त्रीधन कहे हैं। विवाह में पति की तरफ़ से मिला धन और खुशी से पति का दिया धन, पति के जीते स्त्री मर जाय तो वह धन उसके पुत्र का होता है। ब्राह्म, दैव, आर्ष, गान्धर्व और प्राजापत्यनामक विवाहों में स्त्रियों को जो धन मिलता है वह स्त्री सन्तानहीन मरजाय तो पति का होता है। और आसुरादि विवाहों में जो स्त्री को धन मिले वह स्त्री सन्तानहीन मर जाय तो उसके माता-पिता का होता है ॥ १९४-१९७ ॥ स्त्रिया तु यद्भवेद्वित्तं पित्रा दत्तं कथंचन । ब्राह्मणी तद्धरेत्कन्या तदपत्यस्य वा भवेत् ॥ १९८ ॥ न निर्हारं स्त्रियः कुर्युः कुटुम्बाद्बहुमध्यगात् । स्वकादपि च वित्ताद्धि स्वस्य भर्तुरनाज्ञया ॥ १९९ ॥