मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३५२ मनुस्मृति । पत्यौ जीवति यः स्त्रीभिरलङ्कारो धृतो भवेत् । न तं भजेरन् दायादा भजमानाः पतन्ति ते ॥ २०० ॥ अनंशौ क्लीबपतितौ जात्यन्धबधिरौ तथा । उन्मत्तजडमूंकांश्च ये च केचिन्निरिन्द्रियाः ॥ २०१ ॥ सर्वेषामपि तु न्याय्यं दातुं शक्त्या मनीषिणा । ग्रासाच्छादनमत्यन्तं पतितो ह्यददन् भवेत् ॥ २०२ ॥ स्त्री के पास जो कुछ धन किसी भांति पिता का दिया हो, वह उसकी ब्राह्मणी कन्या ग्रहण करे अथवा उसकी सन्तान का हो जावे। बहुत कुटुम्बवाले परिवार में स्त्री धन संचय (कोरचा) न करे और पति की आज्ञा बिना अपने धन में से भी आभूषण न बनवावे। पति के जीते स्त्रियों का जो गहना हो, उसको हिस्से- दार न बाँटें—ऐसा करने से पतित होजाते हैं। नपुंसक, पतित, जन्मान्ध, बधिर, उन्मत्त, जड़, मूक और जो जन्म से निरिन्द्रिय हों, ये सब पिता के धन में भाग नहीं पाते। इन सब को जीवनभर यथाशक्ति भोजन वस्त्र दे, न देने से पतित होता है ॥ १६८-२०२॥ यद्यर्थिता तु दारैः स्यात्क्लीबादीनां कथंचन । तेषामुत्पन्नतन्तूनामपत्यं दायमर्हति ॥ २०३ ॥ यत्किंचित्पितरि प्रेते धनं ज्येष्ठोऽधिगच्छति । भागो यवीयसां तत्र यदि विद्यानुपालितः ॥ २०४ ॥ अविद्यानां तु सर्वेषामीहातश्चेद्धनं भवेत् । समस्तत्र विभागः स्यादपित्र्य इति धारणा ॥ २०५ ॥ यदि नपुंसक आदि के किसी प्रकार विवाह से क्षेत्रज सन्तान पैदा हों तो उनके सन्तान धन के भागी होंगे। पिता की मृत्यु के बाद ज्येष्ठ पुत्र जो धन पावे यदि छोटा भाई विद्वान् हो तो उस में भी उसका भाग है। सब भाइयों का यदि व्यापार से