भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 523, कुल 649 में से

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पृष्ठ 523

दसवां अध्याय। ३८३ कही गई हैं। इन में छिपी या प्रकट जातियों को उनके कर्मों से जानना चाहिए। अपनी जाति और पिछली जाति की स्त्री में द्विज के पैदाकिए छः पुत्र उपनयन संस्कार के योग्य होते हैं। और प्रति- लोम से उत्पन्न हुए सब शूद्र के समान माने जाते हैं। तप के प्रभाव से (विश्वामित्र) और बीज के प्रभाव से (ऋष्यशृङ्ग) सब युगों में मनुष्यजन्म की उंचाई और निचाई को प्राप्त होते हैं। पुंड्र, उड्र, द्रविड़, कम्बोज, यवन, शक, पारद, अपह्व, चीन, किरात, दरद और खसदेश के क्षत्रियगण धीरे धीरे धर्मक्रियाओं को छोड़ देने से और धर्मोपदेशक ब्राह्मणों का संग न करने से वृषल-म्लेच्छ- पने को प्राप्त होगये। इस जगत् में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- जाति के पुरुष जो क्रिया के लोप से पतित जाति के होगए हों, वे आर्यभाषा बोलें या म्लेच्छभाषा, पर उन को ‘दस्यु’ चोर सम- झना चाहिए *। द्विजों में जिनको अपसद् वा वर्णसंकर कहा है वे द्विजों के ही दूषित कामों से जीविका करें। सूतों का काम, घोड़े का सारथि होना, अम्बष्ठों का चिकित्सा, वैदेहों का अन्तःपुर का काम और मागधों का व्यापार कर्म है॥ ४०-४७॥ मत्स्यघातो निषादानां त्वष्टिस्त्वायोगवस्य च। मेदान्ध्रचुञ्चुमद्गूनामारण्यपशुहिंसनम् ॥ ४८ ॥ क्षत्तूग्रपुक्कसानां तु बिलौको वधबन्धनम् । धिग्वणानां चर्मकार्यं वेणानां भाण्डवादनम् ॥ ४९ ॥ चैत्यद्रुमश्मशानेषु शैलेषूपवनेषु च ।

  • इसीलिए जिन देशों में ब्राह्मणादि आर्यजन निवास नहीं करते वे देश ‘कीकट’ आदि निंद्य शब्दों से वेद में लिखे हैं। जैसा—‘किं ते कृण्वन्ति कीकटेषु गावः’। यास्क मुनि ने निरुक्त में व्याख्या की है—‘कीकटो नाम देशोऽनार्यनिवासः...’। शक, यवन आदि म्लेच्छों के भाषा शब्द हमारी आर्यभाषा से बहुत मिलते हैं। इससे अनुमान होता है सबका मूल कुटुम्ब एक ही था। देश और कर्म त्याग से अनार्य होगये हैं।