मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 524, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें३८४ मनुस्मृति । वसेयुरेते विज्ञाता वर्तयन्तः स्वकर्मभिः ॥ ५० ॥ चण्डालश्वपचानां तु बहिर्ग्रामात्प्रतिश्रयः । अपपात्राश्च कर्त्तव्या धनमेषां श्वगर्दभम् ॥ ५१ ॥ वासांसि मृतचैलानि भिन्नभाण्डेषु भोजनम् । कार्ष्णाय समलङ्कारः परिव्रज्या च नित्यशः ॥ ५२ ॥ न तैः समयमन्विच्छेत्पुरुषो धर्ममाचरन् । व्यवहारो मिथस्तेषां विवाहः सदृशैः सह ॥ ५३ ॥ अन्नमेषां पराधीनं देयं स्याद्भिन्नभाजने । रात्रौ न विचरेयुस्ते ग्रामेषु नगरेषु च ॥ ५४ ॥ दिवाचरेयुः कार्यार्थ चिह्निता राजशासनैः । अबान्धवं चैव शवं निर्हरेयुरिति स्थितिः ॥ ५५ ॥ निषादों का काम मछली मारना, आयोगव का लकड़ी काटना, मेद, आंध्र, चंचु और मद्गुका वनपशुओंको मारना, क्षत्ता, उग्र और पुक्कस का बिलों में रहनेवाले साँप, नौला को मारना वा पकड़ना । धिग्वसों का मोची का काम और वेणों का बाजा बनाने का काम है । क्षत्ता आदि जातिवाले गाँव के पास प्रसिद्ध वृक्ष के नीचे, श्मशान में, पर्वत पर, बगीचे में रहकर अपनी अपनी जीविका को करें । चाण्डाल और श्वपच गाँव के बाहर रहें, इनके पात्रों को काम में न लाना । कुत्ता, गधा आदि इनके धन हैं । ये मुरदा के कफ़न धारण करें, फूटे पात्रों में भोजन करें, लोह के गहने पहनें और रोज़ गांवों में घूमा करें । पुरुष को धर्माचरण के समय इन चाण्डालों का दर्शन भी न करना चाहिए, इनका व्यवहार और विवाह समान-जातिवालों में होना चाहिए । इनका भोजन परा- धीन होवे, फूटे पात्रों में खाने को अन्न देवे और ये लोग रात में गाँव या नगर में न फिरें । राजा की आज्ञा से चपड़ास पाए हुए