मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 525, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंदसवां अध्याय । ३८५ काम के लिए दिन में घूमैं और वे वारिश मुरदों को ले जावैं । यह मर्यादा है ॥ ४८-५५ ॥ वध्यांश्च हन्युः सततं यथाशास्त्रं नृपाज्ञया । वध्यवासांसि गृह्णीयुः शय्याश्चाभरणानि च ॥ ५६ ॥ वर्णापेतमविज्ञातं नरं कलुषयोनिजम् । आर्यरूपमिवानार्यं कर्मभिः स्वैर्विभावयेत् ॥ ५७ ॥ अनार्यता निष्ठुरता क्रूरता निष्क्रियात्मता । पुरुषं व्यञ्जयन्तीह लोके कलुषयोनिजम् ॥ ५८ ॥ पित्र्यं वा भजते शीलं मातुर्वोभयमेव वा । न कथंचन दुर्योनिः प्रकृतिं स्वां नियच्छति ॥ ५६ ॥ कुले मुख्येऽपि जातस्य यस्य स्याद्योनिसंकरः । संश्रयत्येव तच्छीलं नरोऽल्पमपि वा बहु ॥ ६० ॥ यत्र त्वेते परिध्वंसाज्जायन्ते वर्णदूषकाः । राष्ट्रिकैः सह तद्राष्ट्रं क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ ६१ ॥ ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा देहत्यागोऽनुपस्कृतः । स्त्रीबालाभ्युपपत्तौ च बाह्यानां सिद्धिकारणम् ॥ ६२ ॥ जिनको राजाज्ञा से फाँसी का दण्ड हुआ हो उनको शास्त्रानु- सार मारे और उनके वस्त्र, शय्या, आभूषणों को लेवे । जातिभ्रष्ट, वर्णसङ्कर, अपरिचित और आर्य मालूम होनेवाला ऐसे अनार्यों को उनके कर्मों से पहचाने । असभ्यता, कठोरपन, क्रूरता और अना- चार से लोक में पुरुष की वर्णसङ्करता प्रकट होती है । वर्णसङ्कर अपने पिता का या माता का अथवा दोनों का स्वभाव पाता है । वह अपने स्वभाव-शील को किसी भांति छिपा नहीं सकता । वर्ण- सङ्कर उत्तम कुल में पैदा होने पर भी अपने उत्पादक के स्वभाव ४६