मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 533, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशवां अध्याय। ३६३ अजीगर्तः सुतं हन्तुमुपासर्पद् बुभुक्षितः । न चालिप्यत पापेन क्षुत्प्रतीकारमाचरन् ॥ १०५ ॥ श्वमांसमिच्छन्नार्त्तोऽत्तुं धर्माधर्मविचक्षणः । प्राणानां परिरक्षार्थं वामदेवो न लिप्तवान् ॥ १०६ ॥ भरद्वाजः क्षुधार्तस्तु सपुत्रो विजने वने । बह्वीर्गाः प्रतिजग्राह वृधोस्तक्षणो महातपाः ॥ १०७ ॥ क्षुधार्त्तश्चात्तुमभ्यागाद्विश्वामित्रः श्वजाघनीम् । चण्डालहस्तादादाय धर्माधर्मविचक्षणः ॥ १०८ ॥ प्राणान्त दुःख न पड़कर, जो पुरुष मनमाना अन्न खाता है, वह कीच से आकाश के समान, पाप से लिप्त नहीं होता। भूखसे दुःखी अजीगर्त ऋषि (सौ गो के लोभ से) पुत्र मारने को तैयार हुए थे पर उन्हें दोष नहीं लगा। धर्माधर्म के ज्ञाता वामदेव ऋषि क्षुधा से प्राणरक्षार्थ कुत्ता का मांस खाना चाहा। महातपस्वी भरद्वाज पुत्रसहित निर्जन वन में क्षुधा से पीड़ित होकर, वृधु- नामक बढ़ई से बहुत गौ दान में लीथीं। धर्माधर्म के ज्ञाता, विश्वा- मित्र भूख से दुःखी होकर, चाण्डाल के हाथ से कुत्ता की जाँघ लेकर, खाने को उद्यत हुए थे ॥ १०४-१०८ ॥ प्रतिग्रहाद्याजनाद्वा तथैवाध्यापनादपि । प्रतिग्रहः प्रत्यंवरः प्रेत्य विप्रस्य गर्हितः ॥ १०६ ॥ याजनाध्यापने नित्यं क्रियेते संस्कृतात्मनाम् । प्रतिग्रहस्तु क्रियते शूद्रादप्यन्त्यजन्मनः ॥ ११० ॥ जपहोमैरपैत्येनो याजनाध्यापनैः कृतम् । प्रतिग्रहनिमित्तं तु त्यागेन तपसैव च ॥ १११ ॥ ५०