भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 534, कुल 649 में से

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पृष्ठ 534

३६४ मनुस्मृति । दान लेना, यज्ञ कराना और वेद पढ़ाना इनमें दान लेना अधम है और ब्राह्मण को मृत्यु के बाद परलोक में दुःख देता है। क्योंकि याजन और अध्यापन संस्कार वालों को कराये जाते हैं। और प्रतिग्रह शूद्र से भी लिया जाता है । अनुचित-याजन और अध्यापन का पाप जप, होम से दूर होता है और प्रतिग्रह का पाप वस्तु के त्याग से या तप से दूर होता है ॥ १०६-१११ ॥ शिलोञ्छमप्याददीत विप्रोऽजीवन्यतस्ततः । प्रतिग्रहाच्छिलः श्रेयांस्ततोऽप्युञ्छः प्रशस्यते ॥११२॥ सीदद्भिः कुप्यमिच्छद्भिर्धनं वा पृथिवीपतिः । याच्यः स्नातकैर्विप्रैरदित्संस्त्यागमर्हति ॥ ११३ ॥ अकृतं च कृतात्क्षेत्राद्गौरजाविकमेव च । हिरण्यं धान्यमन्नं च पूर्वं पूर्वमदोषवत् ॥ ११४ ॥ सप्तवित्तागमा धर्म्या दायो लाभः क्रयो जयः । प्रयोगः कर्मयोगश्च सत्प्रतिग्रह एव च ॥ ११५ ॥ विद्या शिल्पं भृतिः सेवा गोरक्ष्यं विपणिः कृषिः । धृतिर्भैक्ष्यं कुसीदं च दश जीवनहेतवः ॥ ११६ ॥ ब्राह्मणः क्षत्रियो वापि वृद्धिं चैव प्रयोजयेत् । कामं तु खलु धर्मार्थं दद्यात्पापीयसेऽल्पिकाम् ॥११७॥ चतुर्थमाददानोऽपि क्षत्रियो भागमापदि । प्रजा रक्षन् परं शक्त्या किल्बिषात् प्रतिमुच्यते ॥११८॥ स्वधर्मो विजयस्तस्य नाहवे स्यात्पराङ्मुखः । शस्त्रेण वैश्यान् रक्षित्वा धर्म्यमाहारयेद्बलिम्॥११९॥ किसी उपाय से जीविका न कर सके तो ब्राह्मण शिल, उञ्छको

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