भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 540, कुल 649 में से

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४०० मनुस्मृति । दुःख देकर, जो पुरुष परलोक के लिए दानादि करता है, वह लोक-परलोक में दुःख फल को करता है । धार्मिक राजा के होते हुए क्षत्रियादि यजमानों का विशेष करके ब्राह्मण का यज्ञ किसी अङ्ग से रुका हो तो धनी वैश्य से जो सोमयज्ञ से रहित हो, उस के धन से मदद ले लेनी चाहिए। यज्ञ में दो वा तीन अङ्ग अधूरे हों और वैश्य से उतना धन न मिले तो शूद्र के घर से यथेच्छ धन ले लेय, क्योंकि शूद्र का यज्ञ से कोई सम्बन्ध नहीं है ॥ ८-१३ ॥ योऽनाहिताग्निः शतगुरयज्वा च सहस्रगुः । तयोरपि कुटुम्बाभ्यामाहरेदविचारयन् ॥ १४ ॥ आदाननित्याच्चादातुराहरेदप्रयच्छतः । तथा यशोऽस्य प्रथते धर्मश्चैव प्रवर्धते ॥ १५ ॥ तथैव सप्तमे भक्ते भक्तानि षडनश्नता । अश्वस्तनविधानेन हर्तव्यं हीनकर्मणः ॥ १६ ॥ जो अग्निहोत्री नहीं है ओर सौ १०० गौ का धन रखता है और जिसने यज्ञ न किया हो, पर हज़ार १००० गौ का धन हो, उन दोनों के घर से भी धन लेना चाहिए । जो ब्राह्मण नित्य दान लेता हो पर दान देता न हो, वहभी यज्ञार्थ धन दे तो ले लेना चाहिए । इस कर्म से उसका यश और धर्म बढ़ता है । जिसने तीन दिन तक भोजन न किया हो वह सातवीं खुराक धर्महीन पुरुष से भी अन्न ले लेवे तो कोई दोष नहीं है ॥ १४-१६ ॥ खलात्क्षेत्राद्गाराद्वा यतो वाप्युपलभ्यते । आख्यातव्यं तु तत्तस्मै पृच्छते यदि पृच्छति ॥ १७ ॥ ब्राह्मणस्वं न हर्तव्यं क्षत्रियेण कदाचन । दस्युनिष्क्रिययोस्तु स्वमजीवन् हर्तुमर्हति ॥ १८ ॥