भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 541, कुल 649 में से

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ग्यारहवां अध्याय । ४०१ योऽसाधुभ्योर्थमादाय साधुभ्यः संप्रयच्छति । स कृत्वा प्लवमात्मानं संतारयति तावुभौ ॥ १६ ॥ यद्धनं यज्ञशीलानां देवस्वं तद्विदुर्बुधाः । अयज्वनां तु यद्वित्तमासुरस्वं तदुच्यते ॥ २० ॥ न तस्मिन् धारयेद्दण्डं धार्मिकः पृथिवीपतिः । क्षत्रियस्य हि बालिश्याद् ब्राह्मणः सीदति क्षुधा ॥ २१ ॥ तस्य भृत्यजनं ज्ञात्वा स्वकुटुम्ब्वान् महीपतिः । श्रुतशीले च विज्ञाय वृत्तिं धर्म्यां प्रकल्पयेत् ॥ २२ ॥ कल्पयित्वास्य वृत्तिं च रक्षेदेनं समन्ततः । राजा हि धर्मषड्भागं तस्मात्प्राप्नोति रक्षितात् ॥ २३॥ न यज्ञार्थं धनं शूद्राद्विप्रो भिक्षेत कर्हिचित् । याजमाना हि भिक्षित्वा चण्डालः प्रेत्य जायते ॥ २४॥ खल (खरिहान) खेत या घर से या कहीं से अन्न लावे और उसका स्वामी पूछे तो उससे सत्य बात कह देवे । क्षत्रिय को ब्रा- ह्मण का धन कभी न छीनना चाहिए । यदि निर्वाह न होसके तो दूसरे कुकर्मियों से धन ले लेय । जो पुरुष यज्ञादि धर्म न करने वालों से धन लेकर धर्माचारी सत्पुरुषों को देता है वह अपने को नौका बनाकर उन दोनों को तार देता है । यज्ञादि करनेवालों के धन को देवधन कहते हैं और यज्ञादि धर्म-कर्म न करनेवालों का धन आसुरीधन कहलाता है । ब्राह्मण निर्वाह के लिए कोई दोष भी करे तो भी उसको राजा दण्ड न करे । क्योंकि राजाही के दोषों से ब्राह्मण भूख से दुःख उठाते हैं। ब्राह्मण के परिवार, विद्या, शील आदि को जानकर राजा धर्मार्थ जीविका कायम कर देवे । और चोर वगैरह दुष्टों से रक्षा करे क्योंकि उसके धर्म का छठा भाग राजा पाता है । ब्राह्मण यज्ञ के लिए शूद्र से धन कभी न ५१

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