मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ
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' भूमिका । ' ५३ करते हैं, वा उसको सामान्यतः युगान्तरीय-धर्म बतलाते हैं, वा उसको पिष्टपशुसाध्य कहते हैं, वे सब भ्रान्त अथवा स्वार्थान्ध हैं। जब ' पशुसंज्ञपन ' की चर्चा एक स्थल में नहीं हज़ार स्थलों में है, वेद से लेकर पुराणतक संज्ञपन छिपा नहीं है, वेदद्रोही उसपर 'पशुश्चेन्निहतः स्वर्गं ज्योतिष्टोमे गमिष्यति । स्वपिता यजमानेन तत्र कस्मान्न हन्यते ॥' इत्यादि मज़ाक करते आये हैं, तब क्या संज्ञपन हमारे छिपाने से छिप सकता है ? कथमपि नहीं, और सच्ची बात छिपाकर पापभागी क्यों बना जाय ? जैसे 'अश्वालम्भ' 'अश्वमेध' शब्द का 'अश्व- संज्ञपन' अर्थ छोड़कर 'अश्वस्पर्शन' वा 'अश्वसंगम' अर्थ करते हैं सो सरासर झूठा है। क्योंकि इस कपोलकल्पित अर्थ के अभिप्राय से उक्त शब्द का प्रयोग कहीं न मिलेगा ....इत्यादि । ऐसी दशा में संज्ञपन भ्रान्तिमूलक क्योंकर सिद्ध हो सकता है ? और इस बारे में श्रीभाष्याचार्य-श्रीरामानुजाचार्य ने तथा वेदान्तपारिजातसौरभाचार्य श्रीनिम्बार्काचार्य के शिष्य-वेदान्तकौस्तुभाचार्य श्रीश्रीनिवासाचार्य ने यह श्रुति लिखी है— 'न वा उ एतन् म्रियसे न रिष्यसि देवान् इदेषि पथिभिः सुगेभिः। यत्र यन्ति सुकृतो नापि दुष्कृतस्तत्रत्वा देवः सविता दधातु ॥'
१-२ ' अश्वः आलभ्यते वध्यतेऽत्र । अश्वः मेध्यते वध्यतेऽत्र ' यों ये योगरूढ़ शब्द हैं, केवल यौगिक नहीं हैं । देखिये, वाल्मीकीय रामायण बाल- काण्ड १४ सर्ग ।