मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४ मनुस्मृति । और पूर्णप्रज्ञ दर्शनाचार्य श्रीमध्वाचार्य ने यह वाराह- पुराण का वाक्य लिखा है— ' हिंसा त्ववैदिकी या तु तयाऽनर्थो ध्रुवं भवेत् । वेदोक्तया हिंसया तु नैवानर्थः कथंचन ॥' यह विचार ' अशुद्धमिति चेन्न, शब्दात् ३ । १ । २५ ।' इस ब्रह्मसूत्र के भाष्य में किया है। इस व्यवस्था से ' ओषधयः पशवः- ' ४ । ४० यह मनुवचन भी सहानुभूति रखता है। और जो सांख्यकारिका में आनुश्रविक-कर्म ( त्रेताग्नि- साध्य अनुष्ठान ) को अविशुद्धि, क्षय, अतिशय, इन तीन दोषों से ग्रस्त बतलाया है उसमें कर्मसाध्य स्वर्ग को अनि- त्यता से क्षयवान्, और कर्मफल को न्यूनाधिकभाव से अतिशयवान् बतलाना न्यायसिद्ध है; परंतु कर्म में एकान्ततः अविशुद्धि बतलाना न्यायविरुद्ध है और उपजीव्य ( सांख्य- दर्शन ) से बहिर्भूत है; क्योंकि किसी सांख्यसूत्र से उक्तकर्म की अविशुद्धि नहीं सिद्ध होती प्रत्युत ' अशुद्धमिति चेन्न, शब्दात् ' इस ब्रह्मसूत्र के साथ विरोध खड़ा होता है और इसी सूत्र के शारीरकभाष्य में आचार्य श्री ६ शंकर स्वामी ने ' न हिंस्यात् सर्वाभूतानि' इस शास्त्र को उत्सर्ग और 'अग्नी- षोमीयं पशुमालभेत ' इस शास्त्र को अपवाद व्यवस्थित किया है। और ' अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव तद्दर्शनात् ४।१। १३, इस ब्रह्मसूत्र से आनुश्रविक-कर्म विशेष का ज्ञान में उपयोग बतलाया है । ऐसी स्थिति में 'अविशुद्धिः=सोमादियागस्य पशुबीजादिवधसाधनता ' यह लेख कारिकार्पक्ष-रक्षणार्थ