मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४१६ मनुस्मृति । और अण्डकोशों को काटकर अंजलि में रखकर मरण तक नैऋत्य दिशा में चला जाय । या हाथ में खाट का पाया रखे, चीथड़े पहने, दाढ़ी मूंछों को बढ़ाकर निर्जन वन में एक वर्ष तक सावधानी से निवास करे। और प्राजापत्य व्रत करे । अथवा जितेन्द्रिय होकर, हविष्यान्न, जौ की लपसी खाकर तीन मास तक चान्द्रायण व्रत करे । इन व्रतों से महापातकीपुरुष अपने पापों को दूर करें और उपपातकी लोग आगे लिखे विविध व्रतों से अपने पापों का नाश करें ॥ १०४-१०८ ॥ उपपातकसंयुक्तो गोघ्नो मासं यवान् पिबेत् । कृतवापो वसेद्गोष्ठे चर्मणा तेन संवृतः ॥ १०६ ॥ चतुर्थकालमश्नीयादक्षारलवणं मितम् । गोमूत्रेणाचरेत्स्नानं द्वौ मासौ नियतेन्द्रियः ॥ ११० ॥ दिवानुगच्छेद्गास्तास्तु तिष्ठन्नूर्ध्वं रजः पिबेत् । शुश्रूषित्वा नमस्कृत्य रात्रौ वीरासनं वसेत् ॥ १११ ॥ तिष्ठन्तीष्वनुतिष्ठेत्तु व्रजन्तीष्वप्यनुव्रजेत् । आसीनासु तथासीनो नियतो वीतमत्सरः ॥ ११२ ॥ उपपातकों का प्रायश्चित्त । गोवध करनेवाला मुण्डन कराकर, गोचर्म ओढ़कर एक मास गौगोष्ठमें रहे और जौकी लपसी चाटे। दो मास तक गोमूत्र से स्नान करे, जितेन्द्रिय रहे, चौथे काल (दूसरे दिन सायंकाल) विना नमक का थोड़ा भोजन करे । दिन में गौओं के पीछे फिरे और खड़ा होकर उनके खुर से उड़ी धूर को पिये । गो-सेवा करे, उनको प्रणाम करे, रात में वीरासन से बैठा रहे । सदा गौओं के बैठने पर बैठे और खड़ी होने पर खड़ा हो, चलने पर चले और फिर बैठने पर बैठ जाय । यह सब प्रेमभाव से करे ॥ १०६-११२ ॥