भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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ग्यारहवां अध्याय । ४१५ एतैर्व्रतैरपोहेत पापं स्तेयकृतं द्विजः । गुरुस्त्रीगमनियं तु व्रतैरेभिरपानुदेत् ॥ १०३ ॥ सुवर्ण चोरी का प्रायश्चित्त । सुवर्णचोरी करनेवाला ब्राह्मण राजा के पास जाकर अपना कर्म प्रकट करे और कहे कि मेरे को आप शिक्षा दें—तब राजा उसके कंधे पर से मूसल लेकर उसको एकवार मारे । चोर मारने से शुद्ध होता है और ब्राह्मण तप से शुद्ध होजाता है । जो तप से शुद्ध होना चाहे वह चीर पहन कर वन में ब्रह्महत्या का व्रत करे । इन व्रतों से चोरी के पाप को दूर करे और गुरुपत्नीगमन के पाप को आगे लिखे व्रतों से दूर करे ॥ १००-१०३ ॥ गुरुतल्प्यभिभाष्यैनस्तप्ते स्वप्यादयोमये । सूर्मीं ज्वलन्तीं स्वाश्लिष्येन्मृत्युना स विशुध्यति १०४ स्वयं वा शिश्नवृषणावुत्कृत्याधाय चाञ्जलौ । नैर्ऋतीं दिशमातिष्ठेदानिपातादजिह्मगः ॥ १०५ ॥ खट्वाङ्गी चीरवासा वा श्मश्रुलो विजने वने । प्राजापत्यं चरेत्कृच्छ्रमब्दमेकं समाहितः ॥ १०६ ॥ चान्द्रायणं वा त्रीन्मासानभ्यस्येन्नियतेन्द्रियः । हविष्येण यवाग्वा वा गुरुतल्पापनुत्तये ॥ १०७ ॥ एतैर्व्रतैरपोहेयुर्महापातकिनो मलम् । उपपातकिनस्त्वेवमेभिर्नानाविधैर्व्रतैः ॥ १०८ ॥ गुरुपत्नीगमन-प्रायश्चित्त । गुरुपत्नीगामी अपने पाप को कहकर लोहे की जलती हुई शय्या पर सोवे । या लोह की बनी स्त्री मूर्ति जलती हुई को चिं- पट कर मरने से पाप शुद्ध होता है । अथवा खुदही अपने लिङ्ग