भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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पृष्ठ 554

४१४ मनुस्मृति । वश्य को सुरा-मद्य न पीनी चाहिए । गुड़ की, पीठे की, और महुवे की ये तीन प्रकार की मद्य होती हैं । जैसी गुड़ की है, वैसी ही दूसरी भी है । इस लिए द्विजों को न पीनी चाहिए । मद्य यक्षों का, मांस राक्षसों का और सुरा-आसव पिशाचों का भोजन है। देव-हवि खानेवालें द्विजों को यह कभी न सेवन करनी चाहिए ॥ ६१-६६ ॥ अमेध्ये वा पतेन्मत्तो वैदिकं वाप्युदाहरेत् । अकार्यमन्यत्कुर्याद्वा ब्राह्मणो मदमोहितः ॥ ६७ ॥ यस्य कायगतं ब्रह्म मद्येनाप्लाव्यते सकृत् । तस्य व्यपैति ब्राह्मण्यं शूद्रत्वं च स गच्छति ॥ ६८ ॥ एषा विचित्राभिहिता सुरापानस्य निष्कृतिः । अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि सुवर्णस्तेयनिष्कृतिम् ॥ ६६ ॥ ब्राह्मण मद्यपान करके उसके नशे में अपवित्र स्थान में गिरता है, गोप्य वेदमन्त्र पढ़ता है और अकार्य करता है । जिस ब्राह्मण के शरीर में रहनेवाला वेदज्ञान एकबार भी मद्य से मिल जाता है उसका ब्राह्मणत्व नष्ट होजाता है और शूद्रता को प्राप्त होजाता है। यह सुरापान का प्रायश्चित्त नानाप्रकार का कहा है। अब सोना चुराने का प्रायश्चित्त कहा जायगा ॥ ६७-६६ ॥ सुवर्णस्तेयकृद्विप्रो राजानमभिगम्य तु । स्वकर्म ख्यापयन् ब्रूयान् मांभवाननुशास्त्विति ॥१००॥ गृहीत्वा मुसलं राजा सकृद्धन्यात्तु तं स्वयम् । वधेन शुध्यति स्तेनो ब्राह्मणस्तपसैव तु ॥ १०१ ॥ तपसाऽपनुनुत्सुस्तु सुवर्णस्तेयजं मलम् । चीरवासा द्विजोऽरण्ये चरेद्ब्रह्महणो व्रतम् ॥ १०२ ॥