मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवां अध्याय । ४२६ ज्येष्ठता च निवर्त्तेत ज्येष्ठावाप्यं च यद्धनम् । ज्येष्ठांशं प्राप्नुयाच्चास्य यवीयान्गुणतोऽधिकः ॥१८६॥ प्रायश्चित्ते तु चरिते पूर्णकुम्भमपां नवम् । तेनैव सार्धं प्रास्येयुः स्नात्वा पुण्ये जलाशये ॥१८७॥ स त्वप्सु तं घटं प्रास्य प्रविश्य भवनं स्वकम् । सर्वाणि ज्ञातिकार्याणि यथापूर्वं समाचरेत् ॥ १८८ ॥ एतदेव विधिं कुर्याद्योषित्सु पतितास्वपि । वस्त्रान्नपानं देयं तु वसेयुश्च गृहान्तिके ॥ १८६ ॥ सपिण्ड उनके साथ बोल-चाल उठना-बैठना छोड़ दें । पिता के धन में उसको भाग न दें और लौकिक व्यवहार भी न करें । पतित की ज्येष्ठता और उसके भाग का धन जाता रहता है । इसलिये वह भाग छोटों में जो गुणी हो उसको देना चाहिये । परन्तु वह प्रायश्चित्त करे तो सपिण्ड-बान्धव साथही पवित्र जलाशय में स्नान करें और जल भरा घड़ा उस जलाशय में डालें । ओर घर में आकर जाति के सब काम पूर्ववत् करे । पतित स्त्रियों के विषय में भी यही विधि करे । परन्तु उनको अन्न, वस्त्र, जल देना चाहिए और घर के पास में रहें ॥ १८५-१८६ ॥ एनास्विभिरनिर्णिक्तैर्नार्थं किञ्चित् सहाचरेत् । कृतनिर्णेजनांश्चैव न जुगुप्सेत कर्हिचित् ॥१९०॥ बालघ्नांश्च कृतघ्नांश्च विशुद्धानपि धर्मतः । शरणागतहन्तूंश्च स्त्रीहन्तूंश्च न संवसेत् ॥ १६१ ॥ येषां द्विजानां सावित्री नानूच्येत यथाविधि । तांश्चारयित्वात्रीन्कृच्छ्रान्यथाविध्युपनाययेत् ॥१९२॥