भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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४३६ मनुस्मृति। तथा तथा शरीरं तत्तेनाधर्मेण मुच्यते ॥ २३० ॥ कृत्वा पापं हि संतप्य तस्मात्पापात् प्रमुच्यते । नैवं कुर्यां पुनरिति निवृत्या पूयते तु सः ॥ २३१ ॥ एवं संचिन्त्य मनसा प्रेत्य कर्मफलोदयम् । मनोवाङ्मूर्तिभिर्नित्यं शुभं कर्म समाचरेत् ॥ २३२ ॥ आसन पर उठा बैठा करे, अशक्त हो तो भूमि पर सोवे और ब्रह्मचारी, व्रती, गुरु, देवता और द्विजोंका पूजक होवे । नित्य यथाशक्ति गायत्री और अघमर्षणादि पवित्र मन्त्रों का जप करे । प्रायश्चित्त के सभी व्रतों में यह विधि मान्य है । पापी द्विजों को इन व्रतों से शुद्ध करे और गुप्त पापियों को ब्राह्मणसभा, मन्त्र जप और होम कराकर शुद्ध करे। पाप करनेवाला पाप प्रकट करने, पश्चात्ताप करने और तप स्वाध्याय करने से और आपत्ति में दानही करने से पाप से छूटता है। मनुष्य जैसे जैसे अपने अधर्म प्रकट करता है वैसे वैसेही उससे छूटता है जैसे सांप केंचुल से अलग होजाता है। जैसे जैसे उसका मन दुष्कृत-कर्म की निंदा करता है वैसे वैसे उसका शरीर अधर्म से छूटता है। पाप करने के बाद संताप करके उससे छूटता है और फिर ऐसा न करूंगा-इस संकल्प से पवित्र होता है। परलोक में कर्म- फल मिलता है, ऐसा मन से विचार कर नित्य मन, वाणी और शरीर से शुभकर्म किया करे ॥ २२५-२३२ ॥ अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानात्कृत्वा कर्म विगर्हितम् । तस्माद्विमुक्तिमन्विच्छन् द्वितीयं न समाचरेत् ॥२३३॥ यस्मिन् कर्मण्यस्य कृते मनसः स्यादलाघवम् । तस्मिंस्तावत्तपः कुर्याद्यावत्तुष्टिकरं भवेत् ॥ २३४ ॥ तपो मूलमिदं सर्वं दैवं मानुषकं सुखम् ।