मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 577, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवां अध्याय । ४३७ तपो मध्यं बुधैः प्रोक्तं तपोऽन्तं वेददर्शिभिः ॥ २३५ ॥ ब्राह्मणस्य तपो ज्ञानं तपः क्षत्रस्य रक्षणम् । वैश्यस्य तु तपो वार्त्ता तपः शूद्रस्य सेवनम् २३६ ॥ ऋषयः संयतात्मानः फलमूलानिलाशनाः । तपसैव प्रपश्यन्ति त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ २३७ ॥ औषधान्यगदो विद्या दैवी च विविधा स्थितिः । तपसैव प्रसिद्ध्यन्ति तपस्तेषां हि साधनम् ॥ २३८ ॥ यद्दुस्तरं यद्दुरापं यद्दुर्गं यच्च दुष्करम् । सर्वं तु तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ॥ २३६ ॥ महापातकिनश्चैव शेषाश्चाकार्यकारिणः । तपसैव सुतप्तेन मुच्यन्ते किल्विषायततः ॥ २४० ॥ जानकर वा न जानकर निंदित कर्म करके उससे छुटकारा चाहनेवाला फिर दूसरा पापकर्म न करे। पापी के मन में यदि प्रायश्चित्त से संतोष न हो तो जबतक सन्तोष हो तबतक तप करे। देवलोक और मनुष्यलोक के सब सुख तपोमूलक हैं। तप से ही मध्य में और अन्त में सुख मिलता है, यह ऋषियों का मत है। ब्राह्मण का ज्ञान तप है, क्षत्रिय का तप रक्षा है, वैश्य का तप व्यापार है और शूद्र का तप सेवा है। संयमी फल, मूल, पवन का आहार करनेवाले ऋषि तप से ही चराचर विश्व को प्रत्यक्ष देखते हैं। रसायन, औषध, ब्रह्मविद्या और स्वर्गादि लोक में निवास ये सब तप से ही सिद्ध होते हैं। उनके साधन तपही हैं। जो दुस्तर है, दुर्लभ है, दुर्गम है, दुष्कर है, वह सब तप से सिद्ध होजाता है। क्योंकि तप की शक्ति अलङ्घ्य है। महापातकी और उपपातकी सब तप करने सेही उस पाप से छूटते हैं ॥२३३-२४०॥ कीटाश्चाहि पतङ्गाश्च पशवश्च वयांसि च ।