भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 586, कुल 649 में से

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४४६ : मनुस्मृति । व्यपेत कल्मषोऽभ्येति तावेवोभौ महौजसौ ॥ १८ ॥ तौ धर्म पश्यतस्तस्य पापं चातन्द्रितौ सह । याभ्यां प्राप्नोति संपृक्तः प्रेत्येह च सुखासुखम् ॥ १९ ॥ यद्याचरति धर्म स प्रायशो धर्ममल्पशः । तैरेव चावृतो भूतैः स्वर्गे सुखमुपाश्नुते ॥ २० ॥ यदि तु प्रायशो धर्मं सेवते धर्ममल्पशः । तैर्भूतैः स परित्यक्तो यामीः प्राप्नोति यातनाः ॥ २१ ॥ यामीस्ता यातनाः प्राप्य स जीवो वीतकल्मषः । तान्येव पञ्चभूतानि पुनरप्येति भागशः॥ २२ ॥ उस परमात्मा के शरीर से क्षेत्रज्ञ नामक असंख्य जीव उत्पन्न होते हैं। जो उत्तम-अधम प्राणियों से निरन्तर कर्म कराते हैं। पापीमनुष्यों का शरीर यमयातना के लिए दूसरा सूक्ष्म-पञ्चत- न्मात्रा से उत्पन्न होता है। वह पापी उस शरीर से यमयातना को भोगकर फिर उन पञ्चभूतों की मात्राओं में विभाग के अनु- सार लीन होजाता है। वह सूक्ष्मशरीरी जीव, दुःखों को भोग चुकने पर पापरहित होकर महान् और क्षेत्रज्ञ का आश्रय क- रता है। वे महान् और क्षेत्रज्ञ साथ में उस प्राणी के पुण्य-पाप का विचार करते हैं, जिनसे मिला हुआ यहां और परलोक में सुख-दुःख भोगता है। मनुष्यजन्म में यदि वह धर्म अधिक और अधर्म थोड़ा किए रहता है तो उन्हीं पञ्चभूतों से युक्त होकर स्वर्ग में सुख भोगता है। यदि अधर्म अधिक रहता है तो मरकर यमयातना भोगता है । उन यातनाओं को भोगने के बाद निष्पाप होकर वह जीव फिर विभाग के अनुसार पञ्चभूतों का आश्रय लेकर जन्म लेता है ॥ १८-२२ ॥ एता दृष्ट्वास्य जीवस्य गतीः स्वेनैव चेतसा ।

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