मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 587, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंबारहवां अध्याय। ४४७ धर्मतोऽधर्मतश्चैव धर्मे दध्यात्सदा मनः ॥ २३ ॥ सत्त्वं रजस्तमश्चैव त्रीन् विद्यादात्मनो गुणान् । यैर्व्याप्येमान् स्थितो भावान्महान्सर्वानशेषतः ॥ २४॥ यो यदैषां गुणो देहे साकल्येनातिरिच्यते । स तदा तद्गुणप्रायं तं करोति शरीरिणम् ॥ २५ ॥ सत्त्वं ज्ञानं तमोऽज्ञानं रागद्वेषौ रजः स्मृतम् । एतद्व्याप्तिमदे तेषां सर्वभूताश्रितं वपुः ॥ २६ ॥ तत्र यत्प्रीतिसंयुक्तं किञ्चिदात्मनि लक्षयेत् । प्रशान्तमिव शुद्धाभं सत्त्वं तदुपधारयेत् ॥ २७ ॥ यत्तु दुःखसमायुक्तमप्रीतिकरमात्मनः । तद्रजोऽप्रतिघं विद्यात्सततं हारि देहिनाम् ॥ २८ ॥ यत्तु स्यान्मोहसंयुक्तमव्यक्तविषयात्मकम् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत् ॥ २९ ॥ त्रयाणामपि चैतेषां गुणानां यः फलोदयः । अग्र्यो मध्यो जघन्यश्च तं प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ ३० ॥ गुणों का प्रभाव । इन जीवगतियों का जोकि धर्म-अधर्म से होनेवाली हैं अपने मन से विचार करके पुरुष को सदा धर्म में मन टिकाना चा- हिए। सत्त्व, रज और तम ये तीनों आत्मा प्रकृति के गुण हैं। इन्हीं गुणों से व्याप्त महत्तत्त्व, सारे विश्व में स्थित है। इन गुणों में जो गुण जब देह में अधिक होता है तब उस प्राणी को अपने भाव का कर डालता है। वस्तु का वास्तविक ज्ञान सत्त्व- गुण का उलटा ज्ञान तमोगुण का और राग-द्वेष रजोगुण का लक्षण