मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४६२ : मनुस्मृति । वाले नाममात्र से ब्राह्मण जाति के हज़ारों इकट्ठे होजायँ तो भी वह सभा नहीं कही जाती। तमोगुणी धर्म न जाननेवाले, जिसको प्रायश्चित्त बतावैं उसका पाप, सैकड़ों भाग होकर बतलानेवाले को प्राप्त होता है। यह परम कल्याणकारी संपूर्ण साधन कहा गया है। जो द्विज अपने धर्म से विचलित नहीं होता वह परम गति को पाता है। इस प्रकार भगवान् मनुने, मनुष्यों की हितकामना से यह धर्म का सारा तत्त्व कहा था, वही मैंने तुम लोगों से कह सुनाया। मनुष्य संपूर्ण कार्य कारणों को आत्मा में सावधान होकर भावना करे। जो सबको आत्मरूप जानता है उसका मन अधर्म में नहीं जाता ॥१११-११८॥ आत्मैव देवताः सर्वाः सर्वमात्मन्यवस्थितम् । आत्मा हि जनयत्येषां कर्मयोगं शरीरिणाम् ॥ ११९ ॥ खं संनिवेशयेत्खेषु चेष्टनस्पर्शनेऽनिलम् । पक्तिदृष्टयोः परं तेजः स्नेहेऽपो गां च मूर्तिषु ॥ १२० ॥ मनसीन्दुं दिशः श्रोत्रे क्रान्ते विष्णुं बले हरम् । वाच्यग्निं मित्रमुत्सर्गे प्रजने च प्रजापतिम् ॥ १२१ ॥ प्रशासितारं सर्वेषामणीयांसमणोरपि । रुक्माभं स्वप्नधीगम्यं विद्यात्तं पुरुषं परम् ॥ १२२ ॥ एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम् । इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम् ॥ १२३ ॥ एष सर्वाणि भूतानि पञ्चभिर्व्याप्य मूर्त्तिभिः । जन्मवृद्धिक्षयैर्नित्यं संसारयति चक्रवत् ॥ १२४ ॥ एवं यः सर्वभूतेषु पश्यत्यात्मानमात्मना । स सर्व समतामेत्य ब्रह्माभ्येति परं पदम् ॥ १२५ ॥