मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 603, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंबारहवां अध्याय । ४६३ इत्येतन्मानवं शास्त्रं भृगुप्रोक्तं पठन् द्विजः। भवत्याचारवान्नित्यं यथेष्टां प्राप्नुयाद्गतिम् ॥ १२६॥ इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रणीतायां स्मृतौ द्वादशोऽध्यायः समाप्तः ॥ १२ ॥ इन्द्रादि सब देव आत्मस्वरूप हैं, यह सारा जगत् परमात्मा में ही स्थित है। क्योंकि परमात्मा ही प्राणियों को उन के शुभा- शुभ कर्मों का फल देनेवाला है। ज्ञानी पुरुष बाहरी आकाश को आत्माकाश में, वायु को चेष्टा और स्पर्श में, तेज को जठराग्नि में, सूर्य को नेत्र में, जल को शरीर के चिकने पदार्थों में, पृथिवी को शरीर में, चन्द्रमा को मन में, दिशाओं को श्रोत्र में, विष्णु भगवान् को गति में, शिव को बल में, अग्नि को वाणी में, मित्र को गुदा में और प्रजापति को जननेन्द्रिय में भावना करे। संपूर्ण विश्व का शासनकर्ता अणु से भी अणु शुद्ध सुवर्ण समान-कान्तिमय और निर्विकल्प-बुद्धिगम्य परमात्मा को जा- नना चाहिए। इस परमात्मा को कोई अग्नि, कोई मनु, कोई प्रजापति, कोई इन्द्र, कोई प्राण और कोई सनातन ब्रह्म कहते हैं। यह परमात्मा सब प्राणियों को पञ्चभूतों के साथ मिलाकर चक्र के गति की भांति उत्पत्ति, पालन और प्रलयद्वारा घुमाया करता है। इस प्रकार जो पुरुष सब प्राणियों में अपनी आत्मा को देखता है वह सब की समता को पाकर परमपद-ब्रह्म को पाता है। जो द्विज भृगु के कहे इस मानव धर्मशास्त्र को पढ़ता है वह सदाचारी होता है और अभीष्ट उत्तम गति को पाता है ॥ ११९-१२६ ॥ बारहवां अध्याय समाप्त।