मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ
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अकारादिक्रमेण श्लोकानुक्रमणिका ।
| श्लोकः | पृष्ठम् | श्लोकः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| अ | अग्नीनात्मनि वैतानान् ... | १६३ | |
| अकन्येति तु यः कन्याम् ... | २८४ | अग्नीन्धनं भैक्षचर्याम् ... | ४२ |
| अकामतः कृतं पापम् ... | ४०५ | अग्नेः सोमयमाग्यां च ... | १०० |
| अकामतः कृते पापे ... | ४०५ | अग्नेः सोमस्य चैवादौ ... | ७८ |
| अकामतस्तु राजन्यम् ... | ४१६ | अग्नौ प्रास्ताहुतिः ... | ७८ |
| अकामस्य क्रिया काचित् ... | २३ | अग्न्यभावे तु विप्रस्य ... | १०० |
| अकारणं परित्यक्ता ... | ४१ | अग्न्यगारे गवां गोष्ठे ... | १२४ |
| अकारं चाप्युकारं च ... | ३६ | अग्न्याधेयं पाकयज्ञान् ... | ४८ |
| अकुर्वन् विहितं कर्म ... | ४०५ | अग्रयाः सर्वेषु वेदेषु ... | ६६ |
| अकृतं च कृतात्क्षेत्रात् ... | ३६४ | अघं स केवलं भुंक्ते ... | ८५ |
| अकृता वा कृता वापि ... | ३४१ | अङ्गावपीडनायां च ... | २१५ |
| अकृत्वा भैक्षचरणम् ... | ५५ | अङ्गुलीग्रन्थिभेदस्य ... | ३६४ |
| अक्रोधनान्सुप्रसादान् ... | १०१ | अङ्गुष्ठमूलस्य तले ... | ३३ |
| अक्रोधनाः शौचपराः ... | ६७ | अचक्षुर्विषयं दुर्गम् ... | १२७ |
| अक्षमाला वशिष्ठेन ... | ३२१ | अच्छेलेनैव चान्विच्छेत् ... | २७८ |
| अक्षारलवणाश्नाः ... | १७२ | अजडश्चेदपोगण्डः ... | २७१ |
| अक्षेत्रे बीजमुत्सृष्टम् ... | ३८७ | अजाविकं सैकशफम् ... | ३३८ |
| अगारदाही गरदः ... | ६१ | अजाविके तु संरुद्धे ... | २८६ |
| अगुप्ते क्षत्रिया वैश्ये ... | ३११ | अजीगर्तः सुतं हन्तुम् ... | ३६३ |
| अग्निदग्धानग्निदग्धान् ... | ६८ | अजीवंस्तु यथोक्तेन ... | ३८६ |
| अग्निदान्भक्तदांश्चैव ... | ३६४ | अज्ञानात्प्राश्य विण्मूत्रम् ... | ४२३ |
| अग्निपकाशानो वा ... | १६२ | अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाद् ... | ४१६ |
| अग्निमायुर्विम्व्यस्तु ... | ५ | अज्ञानाद्वारुणीं पीत्वा ... | ४२२ |
| अग्निं वाहारयेदेनम् ... | २६५ | अज्ञेभ्यो ग्रन्थिनः श्रेष्ठाः ... | ४५६ |
| अग्निहोत्रं च जुहुयात् ... | ११८ | अज्ञो भवति वै बालः ... | ४१ |
| अग्निहोत्रं समादाय ... | १६० | अण्डजाः पक्षिणः सर्पाः ... | १० |
| अग्निहोत्र्यपविद्ध्याग्नीन् ... | ४०४ | अतन्द्रो मात्राविनाशिष्यः ... | ६ |