भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 649 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 65

[Header] भूमिका । ६३ [/Header]

कता नहीं बनपड़ेगी, सो भ्रममात्र है; देखो-अग्नि विद्युद्रूप से प्रकट हुआ तो उसकी व्यापकता में क्या बाधा है ? कुछ भी नहीं; वायु वात्यारूप से प्रकट हुआ तो उसकी व्यापकता में क्या बाधा है ? कुछ भी नहीं; जगत् के बहुतेरे कार्य सामान्यरूप से नहीं सिद्ध होसकते किंतु विशेषरूप से ही सिद्ध होते हैं जैसे सामान्य अग्नि से पाक नहीं होसकता, सामान्य वायु अग्नि को नहीं चमका सकता, सामान्य जल पिपासा को नहीं शान्त करसकता .... .... इत्यादि । कितने एक अवतारों का लेख वेद में भी प्राप्त होता है । जैसे शतपथब्राह्मण के हविर्यज्ञ नामक प्रथमकाण्ड में अग्निहोत्र वेदी के इतिहास प्रसङ्ग में ‘ वामनो ह विष्णुरास ’ इत्यादि से विष्णु के वामने बनने का उल्लेख, तथा संहिता के सौमिक वेदी प्रतिपादक पञ्चमाध्याय के पन्द्रहवें मन्त्र से विष्णु के त्रिविक्रमत्व का उल्लेख, तथा शतपथ के प्रथम काण्डही में ‘ मनवे हवै प्रातः—’ इत्यादि श्रुति से मत्स्या- वतार की कथा । एवं त्रिपुर आदि का इतिहास । बलराम और कृष्णका अवतार निम्न लिखित श्रुतियोंसे स्पष्ट होताहै- ‘ जज्ञान एव व्यबाधत स्पृधः प्रापश्यद् वीरो अभिपौंस्यं रणम् । अवश्चिदद्रिमत्र सस्यदः सृज- दस्तभ्नान्नकं स्वपस्यया पृथुम् ॥ ’ १ सामान्यशब्द का अर्थ कार्यानुसार व्यवस्थित स्वीकार किया गया है । २ विस्तार भय से श्रुतियां छोड़ दी हैं । इसी बहाने जिज्ञासु लोग उनकी देखभाल करें ।